तीन तलाक मामले पर मीडिया का ध्यान कहीं ज़रूरत से ज़्यादा तो नहीं है?

तीन तलाक मामले पर मीडिया का ध्यान कहीं ज़रूरत से ज़्यादा तो नहीं है?

शाम में फुरसत के वक्त आप टीवी चालू करके बैठ जाइए, बहुत मुमकिन है आपको किसी न किसी मीडिया चैनल पर ट्रिपल तलाक के मामले पर गर्मा गर्म बहस चलती हुई मिल जाए। लेकिन आपने कभी गौर किया कि क्या समस्या वाकई इतनी बड़ी है कि उस पर घंटों बहस की जाए? प्राइम टाइम्स चलाए जाएँ? क्या देश में इससे और अधिक गम्भीर समस्याएँ नहीं हैं, जिन पर वाद-विवाद हो सकता है? Continue reading तीन तलाक मामले पर मीडिया का ध्यान कहीं ज़रूरत से ज़्यादा तो नहीं है?

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किसानों के ‘कंकाल’ होने तक का इंतज़ार,आखिर कब तक?

किसानों के ‘कंकाल’ होने तक का इंतज़ार,आखिर कब तक?

पिछले सप्ताह से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे किसान अपने साथ उन कंकालों को भी लेकर आए हैं जिनकी फसलें तबाह होने के साथ-साथ ज़िंदगियाँ भी तबाह हो गईं. Continue reading किसानों के ‘कंकाल’ होने तक का इंतज़ार,आखिर कब तक?

बच्चन सर! करन सर! आप कंगना मैडम का साथ क्यों नहीं देते?

बच्चन सर! करन सर! आप कंगना मैडम का साथ क्यों नहीं देते?

लेकिन बेहतर होता कि वो अपने प्रोफेशन में भी महिला के हक के लिए आवाज उठाते. जिससे कंगना जैसी दूसरी महिला को अपने हक के लिए लड़ने की प्रेरणा मिलती. Continue reading बच्चन सर! करन सर! आप कंगना मैडम का साथ क्यों नहीं देते?

नॉर्थ-ईस्ट की लड़कियां जो बनी ही छेड़ने के लिए हैं

नॉर्थ-ईस्ट की लड़कियां जो बनी ही छेड़ने के लिए हैं

जी हां! नॉर्थ-ईस्ट की लड़कियां जो बनी ही होती हैं शाम के वक्त छेड़ने के लिए, जो शराब पीती हैं, छोटे कपड़े पहनकर दिल्ली की तंग गलियों में घूमती हैं, आपके साथ ऑटो शेयर कर लेती हैं, यहां तक कि कभी-कभी तो रूम मेट के तौर पर भी शेयरिंग के लिए तैयार हो जाती हैं. Continue reading नॉर्थ-ईस्ट की लड़कियां जो बनी ही छेड़ने के लिए हैं

क्यों गाँव में बसने वाले दलित को गरीबी से निकलने में  तीस साल लग जाते हैं?

क्यों गाँव में बसने वाले दलित को गरीबी से निकलने में तीस साल लग जाते हैं?

साम्राज्यवाद के विरोध से लेकर एक आधुनिक भारत के निर्माण की यात्रा में भी दलित की शिकायत पूरी तरह से दूर क्यों नही हुई और यदि एेसा हुआ भी है,तो आज भी बिहार के गाँव में बसने वाले दलित को गरीबी से निकलने में लगभग तीस वर्ष लग जाते हैं,जबकि किसी गैर दलित के लिए यह अवधि दो साल आँकी गयी है. Continue reading क्यों गाँव में बसने वाले दलित को गरीबी से निकलने में तीस साल लग जाते हैं?