शब्दों के मायने ढूँढता एक ‘साथी’…

ये अक्षर बड़े जादूगर होते हैं साथ ही साथ रोमेंटिक मिजाज़ वाले भी  जैसे ही  एक अक्षर दुसरे अक्षर को प्रपोज़ करता है फ़ौरन दूसरा अक्षर पहले अक्षर  का हाथ थामकर उससे इस कदर घुलमिल जाता है जैसे दोनों सिर्फ एक दुसरे के लिए ही बने हों…कसम से इतना खुबसूरत मिलाप आदमजात में भी  देखने को नहीं मिलता..नतीजा अक्षर-अक्षर का याराना परवान चढ़ता है और सुन्दर-सुन्दर   “शब्दों” की  पैदाइश होती है…और इन शब्दों की जान अटकी होती है अपने मायनों में….IMG_6989 (2)…लेकिन आज के इस बदलते दौर में  क्या ‘शब्द’?क्या ‘अर्थ’?सब आदमजात के नियत के आगे मायूस से लगते हैं…अब शब्दों को देखकर अर्थों के  पता लगाने का समय ख़त्म  सा हो गया है अब शब्दों से उनके  मायनों का अंदाजा लगाना बिल्कुल वैसा ही है जैसे इंसान का मुखड़ा देखकर उसके नियत को बता पाना… शायद  आजकल   अक्षर-अक्षर आदमजात हो गया है और शब्दों के चेहरे भी  अपने रूह मतलब अर्थों से मेल नहीं खाते……तो अब हम शब्दों की नियत बतलब उनके अर्थों को  समझने की कोशिश करेंगे,  हो सकता है शब्दों के बहाने इंसानी नियत की भी तफ्तीश हो जाए….

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