गाय के निबंध में समय के साथ सुधार की ज़रूरत   

बचपन में अक्सर हम लोग गाय पर एक निबंध लिखा करते थे. हमारी कई पीढ़ियाँ यही निबंध लिखकर बड़ी हुई हैं. शायद अब भी बच्चे वही निबंध लिखते होंगे कि गाय एक पालतू पशु है. गाय के चार पैर, एक पूँछ और दो सींग होते हैं. मेरी जानकारी में अभी तक इन तथ्यों में कोई भी बदलाव नहीं आया है.

लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुज़रा, गाय के साथ कई नये तथ्य जुड़ते चले गए. जैसे अब गाय, चुनावों में वोट पाने का साधन बन गई है. दूध, गोबर, गोमूत्र तो गाय सिर्फ़ जीते जी ही देती है लेकिन वोट तो उसके मरने के बाद भी मिलते हैं. यही नहीं, उसकी मौत की झूठी खबर से भी वोट बरसते हैं. वोट पाने के लिए गाय का होना आवश्यक नहीं है, उसका प्रेम ही काफी है. आशा है कि शिक्षाविद् एवं गौरक्षक इस ओर ध्यान देंगे और गाय के निबंध में उचित सुधार लाएंगे.

बात सिर्फ़ यहीं पर समाप्त नहीं होती। इससे बढ़कर भी गाय का प्रयोग भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न प्रकार से वोट बैंक को देखते हुए होता है. अब यूपी को ही ले लीजिए. नवनियुक्त मुख्यमंत्री जी ने सिंहासन संभालते ही कई फैसले ले डाले. शायद उन्हें इस बात का एहसास था कि पुलिस संविधान तो बचा नहीं पाई, अतः उसे संस्कृति बचाने का काम सौंप दिया और एंटी रोमियो स्क्वॉड का गठन कर दिया. साथ ही अवैध रूप से चल रहे बूचड़खानों पर भी तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी. उनके इस फैसले का सभी समुदायों में स्वागत भी हुआ क्योंकि सभी चाहते हैं कि अवैध रूप से चल रहे सभी कार्य बंद हों लेकिन बिना कोई पूर्व चेतावनी दिए, माँस कारोबारियों से उनका रोजगार छीनने के इस फैसले पर सरकार की आलोचना भी हुई. फिलहाल यह कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में बेरोज़गार बैठे एक बड़े तबके को तथाकथित राष्ट्रभक्ति सिखाने का अच्छा अवसर मिल गया है.

लेकिन देखा जाए तो उत्तर प्रदेश का इतिहास भी गाय को लेकर हुए विवादों से परे नहीं है. 28 सितम्बर 2015 को दादरी के बिसाहड़ा गाँव में गौमाँस के शक में हुई बुजुर्ग अखलाक की हत्या ने राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था. इसके बाद 9 अक्तूबर 2015 को मैनपुरी में हुआ विवाद, 30 जुलाई 2016 को मुजफ्फरनगर में गौरक्षा दल द्वारा मचाया गया उपद्रव एवं नई सरकार के गठन के बाद 22 मार्च 2017 को हाथरस में हुई आगजनी की घटना प्रदेश की छवि पर बदनुमा दाग के समान हैं. यही नहीं अगर आप केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद गौरक्षा के नाम पर हुई घटनाओं पर नज़र डालें तो एक लम्बी फेहरिस्त सामने आएगी जो यह बताती है कि गाय को सिर्फ़ हिंसा और वोट बैंक का साधन बनाया गया. गौरक्षा के नाम पर इंसानों की हत्याएं की गईं और आमजनों की आस्थाओं से खुलेआम खिलवाड़ किया गया. सिर्फ़ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली से लेकर केरल, कर्नाटक, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ तक गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी के मामले सामने आए. बीते दिनों राजस्थान के अलवर में तथाकथित गौरक्षकों द्वारा जो घटना अंजाम दी गई, वह घोर निंदनीय है. एक संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसी घटनाएँ अत्यंत घातक हैं. हद तो यह है कि इस घटना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सदस्यों का नाम भी दोषियों की सूची में शामिल है.

यह तो हुई गाय पर आस्था की आड़ में हिंसक घटनाओं को अंजाम देने की बात. अब ज़रा सिक्के का दूसरा पहलू देखिये. चूँकि नार्थ ईस्ट में अगले साल चुनाव होने हैं इसलिए भाजपा का गौरक्षा फार्मूला उन राज्यों में लागू नहीं होगा. नागालैंड भाजपा अध्यक्ष का कहना है कि अगर भाजपा अगले वर्ष राज्य की सत्ता में आती है तो उत्तर प्रदेश जैसा नियम वहाँ लागू नहीं होगा क्योंकि यहाँ कि स्थिति उत्तर प्रदेश से भिन्न है और केंद्रीय नेताओं को इस बात का एहसास है. मिजोरम भाजपा अध्यक्ष के भी बोल बिगड़े नज़र आते हैं. उन्होंने कहा है कि मिजोरम में भाजपा के सत्ता में आने पर राज्य के ईसाई बाहुल्य इलाकों में बीफ बैन नहीं होगा. मेघालय भाजपा अध्यक्ष कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगा है लेकिन हमारे सत्ता में आने पर राज्य में गौहत्या पर प्रतिबंध नहीं होगा बल्कि हम वैध और स्वच्छ रूप से पशुओं की हत्या एवं बिक्री सुनिश्चित करेंगे. इतना ही नहीं केरल उपचुनावों में मल्लपपुरम से भाजपा के एक उम्मीदवार ने जनता को भरोसा दिलाया है कि अगर लोग उन्हें वोट करेंगे तो वह लोगों के लिए अच्छी क्वॉलिटी का गौमाँस उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करेंगे. ज्ञात हो कि ईसाई बाहुल्य प्रदेश होने के कारण नार्थ ईस्ट के अधिकतर राज्यों में गौमाँस पर प्रतिबंध नहीं है. लेकिन अब, जब अगले ही वर्ष चुनाव हैं तो भाजपा अपना रंग बदलती हुई नज़र आ रही है. इसी बीच हैदराबाद से सांसद असद्दुदीन औवेसी ने चुटकी लेते हुए कहा है कि भाजपा का ढोंग यह है कि उनके लिए उत्तर प्रदेश में गाय मम्मी है लेकिन नार्थ ईस्ट में यम्मी है. औवेसी के इस बयान से राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी तेज़ हो गई है.

स्थिति स्पष्ट है, भाजपा कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाकर, अपने सिद्धांतों से पहले ही समझौता कर चुकी है और अब नार्थ ईस्ट में चुनाव के आगमन पर मौके की नज़ाकत को देखते हुए अपनी आस्थाओं से भी समझौता करने के लिए तैयार है. ऐसे में गाय के निबंध में सुधार लाने वाली बात की अहमियत बढ़ जाती है.

 

 

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