यह समय फीस बढ़ाने का नहीं बल्कि प्रोत्साहन बढ़ाने का है

BY-अक्षय दुबे ’साथी’

वक्त के साथ-साथ हमारे भारतीय विश्वविद्यालयों की उत्तरोत्तर तरक्की होनी चाहिए थी.उच्च शिक्षा की सुलभता आम जन तक सहज और प्रभावी ढंग से विकेन्द्रित होनी चाहिए थी किंतु अभी तक हमारी शिक्षा व्यवस्था फीस वृद्धि,सीट कटौती जैसे झंझावतो में ही सिमटकर रह गई है.ऐसे में रिसर्च,अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण विषयों का विमर्श में होना दूर की कौड़ी लगती है.

अभी हाल ही में यूजीसी के द्वारा केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को 10 वर्षों में आय स्वयं बढ़ाने को कहा गया है जिसका त्वरित प्रभाव अब दिखना भी शुरू हो गया है. इस आदेश के बाद छत्तीसगढ़ स्थित गुरूघासीदास विश्वविद्यालय ने छात्रों की फीस में पांच से छः गुना वृद्धि कर दी जिसके बाद यहां के छात्रों ने कुलपति के इस फैसले के खिलाफ जमकर प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. वहीं विश्वविद्यालय प्रबंधन ने भी 250 विद्यार्थियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया साथ ही तीन छात्रों को तीन साल के लिए निलंबित भी कर दिया.इतना ही नहीं रसायन शास्त्र के छात्र जंयत कुमार भारद्वाज का आरोप है कि उनके द्वारा फीस वृद्धि के खिलाफ बोलने की वजह से कुलपति और प्रोफेसर्स द्वारा मारपीट की गई और जाति सूचक गाली दी गई.

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इन घटनाओं के जरिए हम यूजीसी के इस आदेश के बाद छात्रों पर पड़ने वाली मार को बखूबी देख सकते हैं.

एसोशिएसन ऑफ इण्डियन यूनिवर्सिटी के जनरल सेक्रेटरी. प्रो फुरकान कमर का मानना है कि ‘’किसी भी यूनिवर्सिटी की तरक्की के लिए फंड,फैकेल्टी और फ्रीडम इन तीनों का होना बेहद ज़रूरी है.’’ यदि आप सरसरी तौर पर भी इन पैमानों के आधार पर भारतीय विश्वविद्यालयों का मूल्यांकन करेंगे तो आपको अंततः निराशा ही हाथ लगेगी.

अगर हम यूजीसी के इस निर्णय पर गौर करें कि विश्वविद्यालय स्वयं अपना आर्थिक स्रोत तैयार करे तो एक बारगी हमें यह मत आत्मनिर्भरता की चाशनी में डूबी नज़र आएगी वहीं यह भी विचार किया जाए कि बिना फंड,बिना फैकेल्टी और आजादी के आर्थिक स्रोत ढूंढ पाना या निर्मित करना क्या अंधेरे में तीर चलाने जैसा नहीं है.

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अगर हम शिक्षाविदों,आयोगों अथवा शिक्षा पर बनी समितियों की मानें तो यह समय शिक्षा के लिए सरकार द्वारा पर्याप्त धन,संसाधन और वातावरण उपलब्ध कराने का है लेकिन पिछले कुछ बजटों से शिक्षा पर खर्च बढ़ाने की बजाय हमारी सरकारें इन पर कटौती करती जा रही हैं.

1949 में शिक्षा में सुधारों के लिए बनी खेर कमिटी ने सिफारिश की थी कि केंद्र को अपनी आय का 10 फीसदी खर्च शिक्षा पर करना चाहिए.वहीं 1966 में कोठारी आयोग ने कहा कि शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च होना चाहिए. 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी कहा गया कि सरकार को अपनी राष्ट्रीय आय का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करना चाहिए.1996 में सैकिया कमिटी ने भी कहा कि सरकार को जीडीपी का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करना चाहिए.

लेकिन अभी तक हमारी सरकार ने जीडीपी का 4 फीसदी के कम ही शिक्षा को दिया. अगर हम शिक्षा पर  वैश्विक आंकड़ा की ओर देखें तो यहां भी यह खर्च 4.9 फीसदी है. यहां तक  ब्रिक्स के अन्य विकासशील देश भी अपनी जीडीपी का करीब 5 फीसदी शिक्षा पर खर्च करते हैं.हद तो तब हो गई जब बजट 2016-17 में जीडीपी का कुल 3.3 फीसदी की शिक्षा के लिए आवंटित किया गया था. जो कि तय लक्ष्य जीडीपी के 6 फीसदी से काफी कम है.भारत में उच्च शिक्षा की हालत और भी खराब है. यहां करीब 10 फीसदी छात्र ही उच्च शिक्षा में दाखिला लेते हैं जबकि वैश्विक आंकड़ा 26 फीसदी है.उच्च शिक्षा पर जीडीपी का केवल 1.2 फीसदी ही खर्च किया जाता है.

यूजीसी के इस फैसले के बाद विश्वविद्यालय प्रबंधन भी आय के स्रोत के रूप में फीस वृद्धि जैसे  आसान तरीकों के मार्फत अपनी कन्नी काटता नजर आ रहा है,अगर फीस बढ़ोत्तरी की ये मुहिम चलने लगेगी तब इसका व्यापक दुष्प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर ही पड़ेगा, ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ स्थित गुरूघासीदास विश्वविद्यालय का ही लिया जाए तो यहां  2015-16 में लगभग 7000 विद्यार्थियों का नाम दर्ज रहा है.जिसमें लगभग तीन हजार छात्राएं रहीं हैं,अनुसूचित जाति  विद्यार्थियों की संख्या 1000 रही है,वहीं जनजाति छात्रों की संख्या लगभग 700 रही है,अन्य पिछड़ा वर्ग के लगभग 2000 विद्यार्थी अध्ययनरत रहे हैं,अगर जानकारों की माने तो इन विद्यार्थियों पर  फीस वृद्धि का असर साफ तौर पर पड़ेगा इसकी वजह से प्रवेश लेने वाले इन दलित,अनुसूचित और अन्य पिछड़े वर्ग वाले छात्रों समेत छात्राओं की संख्या में कमी आ सकती है. ऐसे भी छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने वाले छात्रों का अनुपात राष्ट्रीय अनुपात से कम है तब आगे की स्थिती इससे भी बदतर होती नजर आएगी.

शिक्षा पर बगैर व्यापक चिंतन किए निर्णय लिया जाता रहा तो हम नैक से एनआईआरएफ बनाते रहेंगे और हमारे विश्वविद्यालय और कॉलेज भी मैकअप कर ग्रैडिंग और रेटिंग के लिए लिए एक दिन की दुल्हन बनकर सजती और संवरती रहेंगी, आर्थिक तौर पर सक्षमता पाने के लिए आम लोगों की जेबें काटी जाएंगी, युवा हतोत्साहित होंगे और कुलमिलाकर शिक्षा का बंठाधार होगा. युवाओं में ऐसे भी आक्रोश का उभार प्रायः अलग-अलग कारणों से देखा ही जा रहा है जिस पर ऐसे फैसले  आग में घी की तरह काम करेंगे. अतः इन फैसलों,मामलों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत क्योंकि यूजीसी के फैसले का पालन और छात्रहितों की रक्षा  साथ-साथ करना असंभव होता जा रहा है ?

 

 

 

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