एंटी रोमियो: प्रेम तो इंसान बना सकता है, मगर कोई डंडा या लोहे की लंगोट नहीं

एकदम नारकीय जीवन में पशुवत जीवन जीते आदमी को प्रेम तो इंसान बना सकता है, मगर कोई डंडा नहीं. न कोई लोहे की लंगोट, बता रहे हैं ललित सती

एक अंग्रेज़ी गाना है – आई एम किसिंग यू. बढ़िया गाना है. ऊपी का रोमियो भी किस करना चाहता है, जूलियट भी चाहती है. लेकिन कहाँ करे. अपने घर में? जूलियट के घर में? वहाँ तो कोई स्कोप नहीं है. स्कूल में? वहाँ भी कोई स्कोप नहीं. सड़कों पर, किसी झील के किनारे? समाज की आँखें सजग हैं.

antiromeonoida-759

कहीं कोई स्कोप नहीं. होटल में कमरा लेने के पैसे नहीं. वे पार्क पहुँचते हैं. किसी झाड़ की आड़ में बैठते हैं. वहाँ पुलिस आ टपकती है. छुप के इसलिए करते हैं लगता है जैसे कोई अपराध करने जा रहे हों. अपराध ही ठैरा. दोनों ने अपने-अपने माँ-बाप को कभी एक दूसरे को बाँहों में लेते नहीं देखा, चूमते हुए देखना तो बहुत दूर की बात है. स्त्री पुरुष संबंध क्या होते हैं वे क्या जानें. बचपन में पता चला था कि भगवान जी की वजह से बच्चा हो जाता है.

बाद में लगा नहीं, कुछ ऐसा नहीं. बस, इतना समझ आया कि रात के अँधेरे में कोई सर्जिकल स्ट्राइक होती है और बच्चे हो जाते हैं, और बस इत्ता ही होता है स्त्री-पुरुष संबंध. लड़का मसें भींजने के साथ अँधेरे में छाती पर हाथ मारना, दबोच लेना टाइप शिक्षा तो अपने सीनियरों से पा लेता है, इससे अधिक परिवार से उसे कुछ ज्ञान नहीं मिल पाता, न स्कूल में कि किसी स्त्री से कैसे व्यवहार किया जाए.

ऐसे पिछड़े परिवेश से आने वाले लड़कों से समझदार लोग कहते हैं – ऐ नालायक, प्रेम महज देह नहीं और यदि प्रेम करते हो तो बग़ावत कर डालो. लड़का, न लड़की, समझ नहीं पाते किससे बग़ावत करें. समझदार कहता है- ग़र बग़ावत नहीं कर सकते तो डूब मरो चुल्लू भर पानी में. चुल्लू भर पानी में डूबना संभव नहीं तो एक दिन रोमियो जूलियट फाँसी खा लेते हैं या किसी नदी में डूब मरते हैं हिंदुस्तान में. इति वार्ता हो जाता है, समाज की संस्कृति बची रह जाती है. समझदार की बात भी सही साबित हो जाती है कि ये जनता ही मूरख व कायर है.

romeos

जो स्पेस हम अपने नौजवानों का छीन रहे हैं, फ्री सेक्स, देह की भूख टाइप फ़ालतू बातें करके, हम नहीं जानते हम कितने असामान्य इंसान तैयार कर रहे हैं. स्त्रियों की तो मुझे नहीं पता, लेकिन पुरुषों में जिन पुरुषों को स्त्रियों का सानिध्य मिला यानी स्त्री का एक इंसान के रूप में सहज स्वाभाविक सानिध्य मिला. जिन्होंने प्रेम किया. जिनके जीवन में कम पाबंदियाँ रहीं. ब्रह्मचर्य के नाम पर पैंतीस-चालीस बरस तक ब्याह होने तक जिन्हें लोहे का लंगोट नहीं पहनना पड़ा, वे कहीं बेहतर पुरुष होते हैं. बूढ़े ठरकियों से अधिक बेहतर ढंग से युवा लोग प्रेम के मायने समझते हैं. युवापन में देह के रहस्य जान लेने की उत्सुकता तो होती है, देह पा लेने की ज़िद नहीं. युवापन में आदमी होता है कहीं अधिक संवेदनशील, कहीं बेहतर इंसान.

ठरकी बुड्ढे क्या ज्ञान पेलते हैं, इसे छोड़िए. अपने नौजवानों को स्पेस दीजिए. पार्कों में नहीं है तो घरों में ही दीजिए. यकीन मानिए ये कोई पाप नहीं.न तो मजनू के पिंजड़े लड़कियों से होने वाली छेड़छाड़ को रोक सके, न कोई एंटी-रोमियो स्क्वाड रोक पाएगा. बस एक भ्रम अवश्य कुछ समय, कुछ बरसों के लिए क्रिएट हो जाएगा, जैसा विमुद्रीकरण के मामले में हुआ.

एकदम नारकीय जीवन में पशुवत जीवन जीते आदमी को प्रेम तो इंसान बना सकता है, मगर कोई डंडा नहीं. न कोई लोहे की लंगोट.पाखंड के लिए आप भले किसी योगी, साधु, संत, मौलवी, “समझदार” के भक्त बने रहें, अपने बच्चों को तो जीवन दें. सुख मिलेगा.

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s