क्या आपने हिंदी की पहली कहानी पढ़ी है?

हिंदी की पहली कहानी को लेकर विद्वानों के बीच आज भी मतभेद है,  विभिन्न कहानियों को ‘पहली कहानी’ कहा जा रहा है, जैसे  सयैद इंशाअल्लाह खाँ की ‘रानी केतकी की कहानी’, राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद की लिखी ‘राजा भोज का सपना’ किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इंदुमती’, माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’, आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ‘ग्यारह वर्ष का समय’  और बंग महिला की ”दुलाई वाली’ अनेक कहानियाँ हैं जिन्हें अनेक विद्वानों ने अपना तर्क रखते हुए हिंदी की पहली कहानी कहा है. हालांकि ज्यादातर लोग माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ पर पहली कहानी होने की मुहर लगाते हैं.

एक टोकरी मिट्टी (टोकनी भर मिट्टी) नाम की ये कहानी ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ नाम की पत्रिका में अप्रैल 1901 के अंक में प्रकाशित हुई थी.लीजिए प्रस्तुत है हिंदी की पहली कहानी…

 

टोकरी भर मिट्टी

माधवराव सप्रे [1900]

किसी श्रीमान् जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी, जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोंपड़ी तक बढा़ने की इच्‍छा हुई, विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी; उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोंपड़ी में मर गया था. पतोहू भी एक पाँच बरस की कन्‍या को छोड़कर चल बसी थी. अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी. जब उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दु:ख के फूट-फूट रोने लगती थी. और जबसे उसने अपने श्रीमान् पड़ोसी की इच्‍छा का हाल सुना, तब से वह मृतप्राय हो गई थी. उस झोंपड़ी में उसका मन लग गया था कि बिना मरे वहाँ से वह निकलना नहीं चाहती थी. श्रीमान् के सब प्रयत्‍न निष्‍फल हुए, तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे. बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्‍होंने अदालत से झोंपड़ी पर अपना कब्‍जा करा लिया और विधवा को वहाँ से निकाल दिया. बिचारी अनाथ तो थी ही, पास-पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी.

एक दिन श्रीमान् उस झोंपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहाँ पहुँची. श्रीमान् ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहाँ से हटा दो. पर वह गिड़गिड़ाकर बोली, ”महाराज, अब तो यह झोंपड़ी तुम्‍हारी ही हो गई है. मैं उसे लेने नहीं आई हूँ. महाराज क्षमा करें तो एक विनती है.” जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा, ”जब से यह झोंपड़ी छूटी है, तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है. मैंने बहुत-कुछ समझाया पर वह एक नहीं मानती. यही कहा करती है कि अपने घर चल. वहीं रोटी खाऊँगी. अब मैंने यह सोचा कि इस झोंपड़ी में से एक टोकरी-भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्‍हा बनाकर रोटी पकाऊँगी. इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी. महाराज कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले आऊँ!” श्रीमान् ने आज्ञा दे दी.

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विधवा झोंपड़ी के भीतर गई. वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्‍मरण हुआ और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी. अपने आंतरिक दु:ख को किसी तरह सँभालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आई. फिर हाथ जोड़कर श्रीमान् से प्रार्थना करने लगी, ”महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइए जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूँ.” जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए. पर जब वह बार-बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके मन में कुछ दया आ गई. किसी नौकर से न कहकर आप ही स्‍वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े.soil on basket

ज्‍योंही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्‍योंही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है. फिर तो उन्‍होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्‍थान पर टोकरी रखी थी, वहाँ से वह एक हाथ भी ऊँची न हुई. वह

लज्जित होकर कहने लगे, ”नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएग.”

यह सुनकर विधवा ने कहा, ”महाराज, नाराज न हों, आपसे एक टोकरी-भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़़ी है. उसका भार आप जन्‍म-भर क्‍योंकर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए.”

जमींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्‍य भूल गए थे पर विधवा के उपर्युक्‍त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गयीं. कृतकर्म का पश्‍चाताप कर उन्‍होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापिस दे दी.

 

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