मैं दावे के साथ कहता हूँ कि गुटखा और तंबाकू धर्म निरपेक्ष है

BY-रजनीश वत्स

आपके घर का सोफा सांप्रदायिक हो सकता है, आपका दरवाजा सांप्रदायिक हो सकता है, आपके प्लेट में आने वाला भोजन कम्यूनल होगा परंतु मैं दावे के साथ कहता हूँ कि गुटखा व तंबाकू धर्म निरपेक्ष है.

आप पर भले साम्प्रदायिकता फ़ैलाने के सैकड़ों इल्जाम लगे हों. आप भले भगवाधारी हों परंतु आपके पॉकेट में रखा गुटखा व तंबाकू पुर्णतः सेकुलर है.

धर्म निरपेक्षता का सर्टिफिकेट रोज बंटता है, हर कोई किसी को सांप्रदायिक साबित करने में लगा है परंतु आजतक कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ है जिसने गुटखे को साम्प्रदायिकता का सर्टिफिकेट दिया हो.

गुटखा और भारतीय गंगा-जमुनी तहजीब में समानता है. जिस तरह से गंगा जमुनी तहजीब भारतीय एकता और धर्म निरपेक्षता का प्रतीक माना जाता है , मौलाओं औऱ संतो को मिलकर गुटखा-तंबाकू को भी इसका मौसेरा भाई घोषित कर देना चाइये ताकि कम से कम एक का आभाव हो तो दूसरे से भी काम चल जाए.

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गुटखे में एक ख़ासियत है …

गुटखा मुंह में जाने के बाद भगवा चोला धारण कर लेता है परंतु आज तक किसी ने भी इसके ऊपर साम्प्रदायिकता का आरोप नहीं लगाया , ये इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है.

आप किसी दूसरे धर्म-सम्प्रदाय के व्यक्ति के हाथ का पानी तक नहीं पीते हो परंतु अगर आप गुटखा-तंबाकू के प्रेमी हैं तो उनके हथेली पर रगड़ें या पॉकेट में पड़े गुटके को बड़े ही स्वाद व अरमान व गर्व से मुंह में धारण करते हैं.

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गुटखा दो धर्मो के बीच सेतु का काम करता है, दो पंथों को जोड़ने में इसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। मैं तो सरकार से मांग करता हूँ कि सरकार आपसी सद्भावना का बोर्ड बनाकर गुटखे को आजीवन इसका अध्यक्ष नियुक्त करे.

ये भी देखने में आया है कि गुटखा ना केवल धार्मिक बल्कि जातिगत, सामाजिक, आर्थिक भेदभाव के निराकरण की भी ताकत रखता है. किसी भी जाति, पद अथवा स्तर पर बैठा आदमी अपने से निम्न से हर तरह का परहेज रख सकता है परंतु जैसे ही गुटखा या तंबाकू की तलब लगती है सारे भेदभाव भूलकर मांगने में हिचक नहीं करता. और इसकी यही खासियत भारत जैसे विविधता पूर्ण देश में एकता की नींव रखती है.

गुटखा खाने वाला हर धर्म का आदमी किसी ना किसी दिवार को गन्दा करेगा. आज तक किसी ने कोई एक दिवार फिक्स नहीं किया है कि अमुक धर्म वाला अमुक दिवार पर थूकेगा इसीलिये तो गुटखा धर्म निरपेक्षता की कसौटी पर उतरने वाला पहला वस्तु है.

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सबसे बड़ी बात आज तक गुटखे पर ना तो कोई फ़तवा आया है औऱ ना ही किसी स्मृति में इसकी आलोचना की गई है. गुटखा खा कर कहाँ थूका जाए इस पर भी कोई धार्मिक नियम नहीं है. बड़े-बड़े ऋषि मुनियों और पेगम्बरों ने भी इसके लिए कोई विशेष् प्रावधान नहीं बताया है और ना ही इससे किसी धर्म विशेष् के मान्यताओं को खतरा बताया है. इसको खाकर ना तो आप काफिर बन सकते हो और ना ही म्लेच्छ.

अतः कुल मिलाकर यह साबित हो चूका है कि गुटखा भारत के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक बुराई के विरोध में एक बड़ा आंदोलन हो सकता है बशर्ते सरकार इसकी अच्छाइयों को मान्यता दे.

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