एक ख़त: मेरे शहर, मेरे दोस्त ‘लखीमपुर’ के नाम

BY- TALHA MANNAN

प्रिय लखीमपुर,

“मेरे हमदम, मेरे दोस्त! आज तुमसे बतियाने का जी कर रहा है. मार्च ढलते-ढलते गर्मी का एहसास बढ़ने लगा है. सोचा, क्यों न तुम्हें एक ख़त लिख दिया जाए? दिल ओ जान से मुबारकबाद देते हुए. यहाँ दूर से तुम्हें देखता हूँ तो जज़्बाती हो जाता हूँ. धड़क से जाते हो तुम सीने में. क़रीब आने को जी चाहता है लेकिन खुद को बंधनों से जकड़ा हुआ पाता हूँ. क्या बात है, पिछले कुछ दिनों से तुम ही तुम नज़र आ रहे हो? सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में तैरते हुए दिखाई दे रहे हो. अभी तक जितना भी जाना और देखा है तुम्हें, तो ऐसा लगता है कि तुम्हें चैन नहीं है. तुम्हारी सड़कें, तुम्हारे जाम, तुम्हारे स्कूल, तुम्हारे कॉलेज, तुम्हारे कोचिंग सेंटर, तुम्हारे नेता तुम्हें कभी शांत रहने नहीं देते.

सुनो लखीमपुर, मेरी जान! थोड़ा सुस्ता लो. तुम्हारे आँगन में जो नफरतें परवान चढ़ रही हैं, उन्हें आग में झोंक दो. आज़ाद हो जाओ तुम इस घटिया सियासत की बेड़ियों से. राजनीति के बोझ तले दबने लगे हो तुम, जिसकी वजह से यहाँ कोई तंगदिल हो गया है तो कोई संगदिल. तुम सबसे कह दो कि यह शहर सभी अमन पसंद लोगों का है सिर्फ़ उनके अलावा जो यहाँ की फिज़ा ख़राब करना चाहते हैं. उनसे कहो कि कहीं और चले जाएँ और तुम्हें कुछ देर तन्हा छोड़ दें. गोया कि यहाँ कभी कुछ हुआ ही न हो. हमेशा की तरह एकदम खुशगवार और खुशनुमा लखीमपुर.

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मेरे दोस्त! ऐसा करो तुम एक किताब बन जाओ, ज़िंदा किताब. जो अपने शहरियों को मुहब्बत के नग्में सुनाती हो. आज के दिन में एक अजीब सा ख़ालीपन है. चलो चलते हैं कम्पनी बाग़ की खाली बेंच पर बैठकर ऊँचे-ऊँचे दरख्तों को निहारते हैं. मैंने तो तुम्हें सुब्ह-ओ-शाम ज़िंदा देखा है. जातिगत बंधनों से दूर,

कभी कन्हैया और कान्हा के बताशे खाते हुए तो कभी स्टेशन वाले मोमोज़ का लुत्फ उठाते हुए, कभी पप्पू और दामोदर के समोसे की दुकानों पर तो कभी कपूरथला वाली रोड पर बेकरियों के चक्कर काटते हुए, कभी खपरैल बाज़ार की चकाचौंध में घूमते हुए तो कभी मंडे मार्केट में इधर-उधर चहलकदमी करते हुए. मैंने तुम्हें ज़िंदा देखा है, कभी संकटा देवी पर आरती की थाली सजाते हुए तो कभी जामा मस्जिद की रौनक बढ़ाते हुए, कभी ओयल स्थित वास्तुकला के उस अद्भुत नमूने में तो कभी देवकली की पाकीज़ा फिज़ाओं में, कभी शारदा की न थकने वाली धाराओं में तो कभी दुधवा की पुरसुकून वादियों में.

फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि तुम नाराज़ हो गये अपने चाहने वालों से? ऐसे भला रूठता है कोई अपने लोगों से? तुम उन्हें क्यों नहीं समझा देते कि किसी के कुछ कह देने मात्र से मज़हब ख़तरे में नहीं आ जाते. सियासी चोला ओढ़े इन तथाकथित मज़हबी ठेकेदार मौलवियों और पंडितों की बयानबाज़ियों से न तो इस्लाम धर्म ख़तरे में आ जायेगा और न ही सनातन धर्म. तुम क्यों नहीं कह देते अपने शहरियों से कि सियासत में न पड़कर अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब को बाकी रखें.

मेरे दोस्त! महीना मार्च का और दिल जून सा? कब तक तुम बेमौसम बेनूर बने रहोगे? आज तो उत्सव का दिन है. आबाद कर दो यहाँ के जवाँ दिलों को. लोग बात करें तो ज़ुबान से इश्क टपके, ख़ामोश रहें तो लगे मिट्टी में नमी बैठ गयी है. लगे कि इस शहर से हुकूमतें चली गईं हैं, ट्रैफिक जाम ख़त्म हो गये हैं, गालियाँ अब निकलती नहीं और लठैत चौराहों पर मिलते नहीं. मिलते हैं तो सिर्फ दिल, ग़ालिब की ग़ज़लें और तुलसी की चौपाईयाँ गाते हुए. लखीमपुर! आज इस रंग भरे माहौल में तुम फिर से आबाद हो जाओ, फिर से धड़कने लगो, हम सब को धड़का दो, हम सब को ज़िंदा कर दो क्योंकि हम सब तुम्हारे लिए जागना चाहते हैं, तुम्हारे लिए जीना चाहते हैं, तुम्हें आबाद करना चाहते हैं. ख़्वाब हैं कि आते ही नहीं, तुम हमारे ख़्वाब लौटा दो. और हाँ! कहना भूल गया था, इस ख़त को अपने दिल के किसी कोने में छुपा लेना, शारदा में मत बहा देना”

तुम्हारा दोस्त
तल्हा मन्नान

 

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