वे पाँच बातें जिसकी वज़ह से इरोम शर्मिला को हार का सामना करना पड़ा

 

BY- AKSHAY DUBEY ‘SAATHI’

14 मार्च को इरोम शर्मिला 45 वर्ष की होने जा रही हैं,और इससे ठीक तीन दिन पहले आए चुनाव परिणाम ने इरोम चानू शर्मिला सहित लाखों लोगों को अंदर तक हिला कर रख दिया.

16 साल तक भूखी-प्यासी रहकर अफस्पा के विरोध में अपनी जवानी होम कर देने वाली इरोम शर्मिला अगस्त 2016 में यह सोचकर अनशन ख़त्म करती है कि वे अब सरकारी तंत्र में सम्मिलित होकर इस लड़ाई को गति देंगी.. जिसके लिए उन्होंने पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस के नाम से पार्टी बनाई और चुनाव लड़ने का ऐलान किया ,लेकिन थोबल सीट से वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ लड़ने वाली इरोम को सिर्फ 90 वोट ही मिल पाए. ये भी मान लिया जाए कि वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ने का उनका फैसला ग़लत रहा हो फिर भी केवल नब्बे वोट तक सिमट जाना रास नहीं आता.आइए जानने की कोशिश करते हैं कि किन कारणों से  इरोम चानू शर्मिला को इस तरह हार का सामना करना पड़ा..

 

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  1. मुख्यमंत्री के ख़िलाफ खड़ा होना

अधिकतर लोग चानू के इस फैसले को भी एक चूक की तरह देखते हैं कि उन्हें अगर सचमूच चुनाव जीतना था तो उन्हें मुख्यंमत्री ओकराम इबोबी सिंह की बजाय किसी दूसरे उम्मीदवार के खिलाफ खड़ा होना चाहिए था. क्योंकि सिंह की छवि जनता के समक्ष उतनी बुरी भी नहीं है.

 

  1. प्रचार लिए धन की कमी

क्राउड फडिंग के ज़रिए इरोम की पार्टी महज़ 3-4 लाख रूपय ही जुटा सकी जबकि हमारे देश की सियासत काफी खर्चीली है,जिसमें बड़ी मोटी रकम की ज़रूरत होती है, मान भी लिया जाए कि 16 साल तक संघर्ष करने के बाद इसकी ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए लेकिन इस संघर्ष को आक्रामक तरीके से जनता तक पहुँचाने के लिए प्रचार-प्रसार की निहायत ज़रूरत पड़ती है.जनता आज भी चुनाव के समय आक्रामक तरीके से किए गए कैंपेन से भरपूर प्रभावित होती है.

 

  1. चुनावी मुद्दों से दूरी

ये भी कहा जा रहा है कि आज का मणिपुर पहले की तरह नहीं रहा ऐसे में  केवल किसी एक मुद्दे पर केन्द्रीत होकर चुनाव नहीं जीता जा सकता,जनता को नहीं रिझाया जा सकता.जैसा कि इरोम की छवि अफ्सपा हटाने की मुहिम की तौर पर ही सिमट कर रह गई है,जबकि  बिजली,पानी,सड़के,रोजगार जैसे मुद्दे वहां की जनता के लिए अब ज़्यादा ज़रूरी मुद्दा बना हुआ है.

  1. जनता का माइण्ड सेट

सबसे महत्वपूर्ण यह बिंदू है कि जनता का मूड क्या है? जनता का स्वभाव कैसा है?  जब इरोम शर्मिला अनसन में थी तब उनके हज़ारों की तादात में समर्थक होते थे, लेकिन राजनीति में कदम रखने के बाद इस तरह की वस्तुस्थिति इस ओर भी इशारा करती है कि जनता को राजनीति में ठेठ राजनीतिक छवि वाले व्यक्ति ही पसंद है,कहा जा रहा है कि इरोम शर्मिला आंदोलनकारी हैं उन्हें आंदोलन के ज़रिए अपनी चीज़े रखनी चाहिए. इसीलिए इरोम के द्वारा भूख हड़ताल ख़त्म कर राजनीति में आना कइयों के लिए तक़लीफदेह भी रहा.

  1. विसंगति

जनता भी मुख़्तार,राजा,अमनमणि जैसों पर भरोसा कर लेती है और उनके दमखम को सराहती है वहीं किसी ईमानदार और सरल तरीके से रहने वाले नेता को अपेक्षाकृत ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है. जनता का मन अभी भी सामंतवादी और राजशाही चंगुल से पूरी तरह आज़ाद नहीं हो पाई है.

चानू कहती हैं कि ‘‘मैं जैसी हूँ, उस तरह लोगो ने मुझे स्वीकार नहीं किया,मैं खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हूँ.’’ चानू इरोम शर्मिला से किसी की लाख असहमति हो लेकिन इस परिणाम के बाद सभी लोग खुद को ठगा हुआ और असहज महसूस कर रहे हैं.

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