श्री कृष्ण ने गीता के पहले श्लोक में ही एक्जिट पोल का ज़िक्र किया था !

BY- रजनीश वत्स

एक्जिट पोल अभिलाषा है , एक्जिट पोल निराशा है
एक्जिट पोल तमाशा है हलवाई का बताशा है..श्रीकृष्ण ने गीता के पहले श्लोक में भी एक्जिट पोल का ही जिक्र किया था. ”अहम् एक्जिट पोलं” मैं ही एक्जिट पोल हूँ, और मैं ही इस युद्ध  के परिणाम को पहले बता सकता हूँ,  उसी राह पर चलते हुये आज एक्जिट पोल की ज़रूरत महसूस हुई होगी.

एक्जिट पोल एक कितना मासूम सा नाम है, बेचारा, सर्वहारा वर्ग का प्रतीक. कितने बेरोजगार पत्रकार को मौका देता है, अपना पक्ष रखने का , चुनावी मुद्दे पर बोलने का. अपना विश्लेषण देने का, भले अगले 1-2 दिन में उनका विश्लेषण तेल लेने चला जाये पर मौका तो देता है. एक्जिट पोल एक महान कार्य कर रहा है इस देश में. यह राजनैतिक दलों में नव ऊर्जा का संचार करता है. यह चुनावी अभियान में घिसे पिटे , थके मांदे नेताओं को आस प्रदान करता है. यह कार्यकर्ताओं में नई जोश भरता है, भले दो दिन बाद वो जोश ठंडा होकर राख हो जाए.

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मैं तो कहता हूँ कि एक्जिट पोल को राष्ट्रीय संस्था के रूप में मान्यता मिले ताकि यह जनभावनाओं के नाम पर तमाम बकलोली को पेश कर सके. बकलोली से याद आया कि आज तो पूरा देश बकलोली में लगा हुआ, जब भी चुनावी मौसम आया नहीं कि पूरा देश बकलोली करना शुरू कर देता है. पान के दूकान पर जितनी पीकेँ नहीं फेंकी जाती उससे दुगुनी बकलोली फेंकी जाती है. अब अमर सिंह सपा के साथ हैं या जया प्रदा के साथ इस पर की गई बकलोली ने थ्रशहोल्ड लेवल को पार कर लिया है. खैर ! मैं भटक रहा हूँ, एक्जिट पोल की बात थी. एक्जिट पोल भी तो अक्सर भटक जाता है, कभी भी इसने एक्जैक्ट पोल नहीं दिया फिर भी लोग चुनाव खत्म होने की संध्या पर इसका इस बेसब्री से इंतजार करते हैं जिस बेसब्री से मैंने कभी अपनी माशूका का इंतजार नहीं किया होगा.

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एक्जिट पोल एक्जैक्ट हो ना हो परन्तु उसमें जीतने वाले दल का प्रवक्ता सीना फुलाए ऐसे बोलता है जैसे ताजपोशी करवाने आया हो वहीं हारने वाले दल का प्रवक्ता सड़े बैंगन सा मुंह बनाये एक्जिट पोल की सच्चाई को नकारता है, वही यदि दूसरे चैनल पर उसका दल जीतने लगे तो फिर उसका भी सीना फुल जाएगा.

मुझे लगता है कि एक्जिट पोल एक खेल है जो परिणामों कुछेक रोज पहले टीवी चैनल वाले नेताओं से खेलते हैं, जो नेता जीतने के बाद जनता से खेलने वाले होते हैं. दरअसल इसका आनंद किसी क्रिकेट या कॉमेडियन के शो से कम नहीं होता. ये लगा छक्का और समाजवादी पार्टी जीत गई, ये लगा चौका और अब भाजपा जीतने वाली है. हर चैनल पर एक अलग पाल्टी जीतने वाली होती है.
दरअसल एक्जिट पोल वो दिलफेंक प्रेमिका या प्रेमी है जिसे प्रेमियों या प्रेमिकाओं के दिलों से खेलना आनंदमयी प्रतीत होता है, बड़े-बड़े जीत के आंकड़े देकर हारने के अंतिम स्थिति तक पहुँचाने का कारनामा एक दिलफेंक प्रेमिका या प्रेमी ही कर सकते हैं और एक्जिट पोल इस खेल में माहिर है.

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एक्जिट पोल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप अपने मनचाहे दल को जब मन किया जीता देते हैं, जिसको मन किया हरा दिया. इंसान क्षणिक आनन्द के लिये ही जीता है और वो क्षणिक आनन्द हमें एक्जिट पोल प्रदान करता है.
एक्जिट पोल के बड़े फायदे हैं, इसके द्वारा आप जीत हार की कल्पना तो कर सकते हैं पर सरकार नहीं बना सकते और सरकार बनी ही नहीं तो फिर नीतियां, विचारधारा लागु कैसे होंगी, कहने का मतलब हींग लगे ना फिटकिरी रंग भी चोखा होय.
वैसे एक्जिट पोल के दावे और राजनैतिक दलों के वादे में थोड़ा बहुत ही अंतर होता है, सो यदि एक्जिट पोल किसी सरकार को बनने का दावा कर रहा हो तो पिछले सत्तर सालों के वादों का पिटारा खोलिये और रोटी/पराठा के साथ चटनी बनाकर जठर की क्षुधा शान्त कीजिए.

एक्जिट पोल की वंदना में अभी बहुत कुछ है परंतु हम तो ठहरे ऑफिस के मजदूर काम नहीं किया तो हमारा पोल निकल सकता है.
सो इति एक्जिट पोल अध्यायम स्वाहा….

 

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