माँ-बहन एक करने वाली मानसिकता को आप कब ब्लॉक करोगे?

BY- AKSHAY DUBEY ‘SAATHI’

यह लेख सोशल मीडिया पर बने ‘जनमत’ जैसे उन अनगिनत समूहों और व्यक्तियों के लिए है,जो महिला विरोधी गालियों के विरूद्ध लिखे गए लेख की भाषा पर आपत्ति दर्ज कराते हैं,उसे ब्लॉक करते हैं लेकिन समाज में प्रचलित महिला विरोधी मानसिकता को ब्लॉक करने की सोचते भी नहीं हैं.

मुझे पता है जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे तब आपका मन मुझे माँ-बहन की गाली देने का कर रहा होगा… कतई इसमें आपका दोष नहीं है, हमने अपने समाज को ही ऐसा रच डाला है कि बगैर महिलाओं को गाली दिए हमें फील नहीं आती.. हमारे पेट का पानी नहीं पचता… आप भी इनमें से अलग नहीं हैं…

शायद आप वही हैं ना ?जो सिनेमा हॉल पर हीरो के  बेमतलब गाली देने पर ठहाके लगाते हैं…सीटी बजाते हैं… आप वही है ना ?जो काशी की अस्सी पर रखे गालियों के गुलदस्तों को अपनी मेज पर सजाते हैं.

आप वही है ना? जो गुस्से में तमतमाकर माँ-बहन एक कर देते हैं…

शायद आप वही है ना?..जो मजाक-मजाक में गालियों की ऐसी बौछार कर देते हैं मानो होली में गुलाल उड़ा रहे हों.. आप वही है ना? जो मौका पड़ने पर अपनी  पत्नी,माँ,बहन,बेटी किसी को नहीं बख्शते… बेशक आप वही हैं जिसके गुस्से की सीमा पार होती है तो किसी का लिहाज़ किए बगैर गालियों की उल्टी कर देते  हैं….

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हो सकता है कि आप साफ सुथरी छवि वाले होने की वजह से  इनमें से किसी भी पैमाने पर खरा ना उतरते हों…  लेकिन पक्का आप वही हैं जिनकी आँखो के सामने आधी आबादी पर कोड़े बरसते हैं; जब कोई अपनी पत्नी,गर्लफ्रैण्ड,बेटी को गाली देता,मारता पीटता आप की आँखो के सामने से किसी फिल्म की तरह रोज़ गुज़र जाते होंगे तब आप अपनी सीट से टस से मस नहीं होते होंगे, क्योंकि इसका प्रसारण  किसी के घरेलू पर्दे पर होता है जिसमें आप की दखल अपनी बनाई हुई मानसिकता के चलते नहीं हो सकती. आप को कभी इस पर भरपूर आपत्ति नहीं हुई होगी.

मैं इसलिए यह बात निश्चित होकर कह सकता हूँ क्योंकि अगर आपको भरपूर आपत्ति हुई होती तो समाज से सारी महिला विरोधी गालियाँ अब तक ब्लॉक हो गई होतीं..

लेकिन आप के फेसबुक की दीवार पर जब कोई समाज के इस भौंडेपन की कलई खोल दे तो आप बिना देर किए,बिना पढ़े उसे मिटा देते हैं,उसे ब्लॉक कर देते हैं यह सोचकर कि किसी की नज़र उस पर ना पड़ जाए, आप वहाँ अपनी आपत्ती दर्ज़ करा कर बड़े खुश होते हैं, अपनी शराफत का लोहा मनवाते हैं,लेकिन समाज के मुँह पर आप कभी तमाचा नहीं जड़ते, तमाचा जड़ना तो दूर आप उनसे अपील तक नहीं करते,उनसे अपील भी छोड़िए खुद को भी आप महिला विरोधी गाली देने से नहीं रोक पाते..

अजीब दास्तान है हम अपने भीतर कूड़ा रखते हैं और अपने चेहरे को रगड़-रगड़कर स्वच्छता अभियान चलाते हैं.

ऐसा नहीं है कि आपके पास कोई सुरक्षित विकल्पों की कमी रही होगी, लेकिन सेंसरशीप का डंडा मिलते ही आप विचारशून्य की हद तक चले जाते हैं और अपने मूड को जनमत का नाम दे देते हैं, आप ही बताइए हड़बड़ी में कोई जनमत लीडर बन सकता है क्या?

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आप दीवार पर लिखी समाज की अश्लील सच्चाई  को देखकर अपना नाक मुँह सिकोड़ सकते हैं,घिनौनी हक़ीकत के बेपर्दा होते ही उसकी सड़न से हवा में फैलने वाली बदबू को नाक में रूमाल डालकर महसूस करने की कोशिश कर सकते हैं.. समाज के भौंडेपन और दोहरे चरित्र की बानगी करती कोई पँक्ति दिखते ही आप उसे ब्लॉक करने या मिटाने की बजाए चींतित होकर उस पर विमर्श कर सकते हैं, लेकिन आपको इतनी फुर्सत कहाँ है इस पचड़े में पड़ने की,आप तस्वीरों को सरसरी निग़ाहों से देखने के आदी हो गए हैं, आप तो क्षणिक राय बनाकर उसे जनमत सिध्द करने में अपना सारा श्रम उड़ेल देते हैं.. आप ना केवल फेसबुक की वाल पर अपनी मॉरल पुलिसिंग की सेवाएँ देते हैं बल्कि बीच चौराहे पर भी अपनी आपत्ती-अनापत्ति की सूसू करते नहीं हिचकते बस आप दीवारों पर लिखी गालियों को मिटाने की सोचते हैं… कभी अपने दिल में लिखी गालियों की तफ्तीश कर उसे मिटाने की बात भी सोचिएगा..   

 

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