साली रांड! हरामन, मेरे जाने के बाद यही काम करती है…

 हर ‘चाँदनी’ की कहानी जो रोज़ किसी लाश सी हो जाती है, बता रहे हैं विशाल शुक्ला 

चटाक! चटाक! चटाक!

साली रांड! हरामन, मेरे जाने के बाद यही काम करती है साली, बहन की ……..

एक आदमी से गरमी नही बुझती न तेरी …आ तेरी सारी गरमा उतारता हूँ आज….

अंबेडकर चौक की उस पतली सी गली के मकान की दूसरी मंजिल पर रहने वाले राजेश ने अपनी पत्नी चांदनी पर चीखते हुए कहा….

domestic violence6

ये कोई नई बात नही थी, 7 बरस हुए थे चांदनी की शादी को, इन सात बरसों में गर चाँदनी ने कुछ पाया था तो वो ये था कि …हर शाम मिलने वाली जिस्मानी मार खाने के बाद वो एक लाश सी हो जाती थी, और जब उठती तो लगता मानो एक लाश ने आँखे खोल दीं हों. इन सात सालों में एक चलती फिरती लाश ही तो हो गई थी वो.हर पल ऐसा लगता मानो मजबूरी और आर्थिक असुरक्षा नाम के कीड़े उसके जिस्म को नोच नोच कर खा रहे हों.

19 बरस की उम्र में शादी के बाद 26 की थी वो अब, पर जो भी उसे देखता, या तो उसमें जिंदगी को ढोती लाश का नरकंकाल नजर आता या मजबूरी और तंगी के कीड़ों द्वारा अधखाया गोश्त….

shutterstock_178086416.jpg.CROP.promo-xlarge2

यूँ तो उसका पिटना और गाली खाना उसकी नियति सी बन चुकी थी पर उस शाम कुछ अलग सा हुआ, ज्योंहि उसने 5 साल के बेटी पीहू पर हाथ उठाया, पहली मंजिल से उपर ये ‘तमाशा’ देखने पहुँचे ‘बिलाल’ से रहा नही गया, उसने मन ही मन सोचा कि अब वो इस जलील आदमी को सबक सिखाकर ही रहेगा.

पाठको! इस कहानी में नया क्या था? कुछ भी तो नही, हम हर रोज हमारे आस पास ऐसी कहानियाँ देखते,सुनते और महसूस करते होंगे ये तो जलसे का केवल एक स्याह पक्ष भर था, जिसे आज हम और आप ‘अंतराष्ट्रीय महिला दिवस’ के नाम से मना रहे हैं.

असल में ये लड़ाई किसी एक समपन्न, गरीब या मध्यवर्ग की लड़ाई नही हर जगह अलग –अलग शक्ल में हैं.

Domestic_Abuse_t750x550-600x400

सबसे पहले पैदा होने की जद्दोजहद के साथ शुरु होती है, अगर बेटी पैदा हो भी गई, तो पढ़ने से लेकर उसकी जवानी तक उसके हँसने-खिलखिलाने उसके दुपट्टे-आँचल और छाती तक पहरा देने वाले ‘नायक’ पैदा हो जाते हैं. अपने बलबूते अगर वो स्कूल कॉलेज पहुँची भी तो फिर उसे कॉलेज के किसी नाटक में ब्रा-पैंटी जैसे शब्दों को बोलने नही दिया जाएगा या फिर किसी गुरमेहर कौर की शक्ल में ट्रोल कर दिया जाएगा. और यकीन मानिए यहाँ भी पाबंदी लगाने वाले वही पहरेदार होंगे जो अब तक उसके दुपट्टे-आँचल और छाती पर पहरा देते आए हैं.

आखिर समझ में नही आता कि प्रति 1000 पुरुषों पर 940 का राष्ट्रीय लिंगानुपात, प्रति 1000 पुरुषों पर 947 का ग्रामीण लिंगानुपात , 65.46 की महिला साक्षरता और 56.66 की ग्रामीण साक्षरता के साथ आखिर आधी आबादी पर सीजनल देशभक्तों के हमले कब तक सहते रहेंगे.

खैर इस सबसे क्या होगा, ये तो हमे भी नही पता, पर ये तय है कि सफाई की शुरुआत खुद करनी पड़ेगी, इस एप्रोच के साथ शायद ही बात कभी आगे वढ़े सके कि ‘भगत सिंह’ पैदा तो हो पर पड़ोंसी के घर में …

आज ही उसे एक क्रेच मे नौकरी मिल गई है, फिलहाल चाँदनी खुश है और बिलाल भी.

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s