बच्चन सर! करन सर! आप कंगना मैडम का साथ क्यों नहीं देते?

देश में राजनीति एक अकेला ऐसा पेशा है, जिसमें सबसे ज्यादा गालियां पड़ती है. जबकि राजनीति होती सभी जगह है.  स्कूल में दाखिले से लेकर ऑफिस में पोस्ट देने के नाम पर हर जगह राजनीति होती है. ऐसी ही राजनीति फिल्मों में रोल देने के नाम पर की जाती है. फिल्मों की इसी राजनीति का जब कंगना ने विरोध किया तो उन्हें बॉलीवुड छोड़ने की सलाह दी गयी.

यह तो असहिष्णुता वाली वैसी ही सलाह थी, जो आमिर और शहरुख को देश की कमियों के खिलाफ बोलने पर देश छोड़ने के लिए दी गयी थी. उस वक्त करन जौहर ने लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी को एक बड़ा मजाक कहा था.वही करन जौहर आज कंगना के मूवी माफिया कह देने पर उन्हें बॉलीवुड छोड़ने की सलाह दे रहे हैं. दरअसल कंगना ने ऐसा कहकर बॉलीवुड के उस परिवारवाद पर चोट कर दी,जिस पर कपूर, भट्ट और बच्चन खानदानों की आने वाली पीढ़ियों का भविष्य टिका है. जो कि नये कलाकारों की राह मुश्किल करती हैं. आलिया भट्ट को करन जौहर लांच करते हैं, तो करन जौहर के बच्चों को महेश भट्ट लांच कर देंगे. बॉलीवुड में सांठगांठ का कुछ ऐसा ही सिलसिला चल रहा है. ऐसा करके परिवारवाद के आरोप से भी बचा जा सकता है. साथ ही लांच किये गये स्टार किड्स इसे अपने दम पर हासिल सफलता कहने का हक हासिल कर लेते हैं.

यह ठीक उसी तरह है कि मोदी जी की सरकार में राजनाथ सिंह के बेटे को लांच किया जाता है और अखिलेश की सरकार में आजम खान के बेटे को लांच किया कर दिया जाता है. जिसे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की ओर से परिवारवाद नहीं माना जाता है. दरअसल समाज में दोहरे मापदंड के ऐसे अनेकों पैमाने मिल जाएंगे. इन सब में बहुत ही कम ऐसे लोग होते हैं, जिसमें सामाजिक मापदंडों को दरकिनार करने का दम होता है. लेकिन शायद कंगना उनमें से एक हैं. जिन्होंने लकीर से हटकर कुछ करने और कुछ कहने का जज्बा दिखाया. अपने करियर की परवाह न करके बॉलीवुड की कमियों पर करारा वार किया.  हालांकि उनके इस हौसले पर अक्सर चोट की जाती रही. कभी उन्हे लीगन नोटिस देकर तो कभी बॉलीवुड छोड़ने की सलाह देकर. लेकिन कंगना ने अपनी बेबाकी के साथ ही अपने काम से खुद को सही ठहराया है.

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वो कंगना ही थी, जिन्होंने तीनों खानों के साथ काम करने से उस वक्त मना कर दिया, जब उनकी साथी अभिनेत्री इन खान के साथ काम करके सफलता पाना चाह रही हो. इतना ही नहीं कंगना ने बॉलीवुड में महिलाओं के मेहनताना जैसे मुद्दो पर भी आवाज उठायी. लेकिन उन्हें किसी पुरुष कलाकार का साथ नहीं मिला. अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेता ने अपनी संपत्ति का बेटे अभिषेक और श्वेता में समान बंटवारा करके महिलाओं के हक को लेकर जागरुक किया, लेकिन बेहतर होता कि वो अपने प्रोफेशन में भी महिला के हक के लिए आवाज उठाते. जिससे कंगना जैसी दूसरी महिला को अपने हक के लिए लड़ने की प्रेरणा मिलती.

अनपढ़ कबीर दास ने कभी लिखा गया था कि निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुहाय. लेकिन समाज बदल रहा है. ऐसे में आज यह दोहा दम तोड़ रहा है. निंदक को कभी असहिष्णु तो कभी देशद्रोही और कभी बागी करार देकर समाज, देश और बॉलीवुड को छोड़ने की मुफ्त सलाह दी जा रही है. जिसका समर्थन आज के पढ़े लिखे समाज की ओर से किया जा रहा है.

Contributed by Saurabh Verma

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