साड़ी का काम ख़ूबसूरती को छुपाना नहीं बल्कि उभारना है: राज कपूर

 

BY- VISHAL SHUKLA

”साड़ी का काम ख़ूबसूरती को छुपाना नहीं बल्कि उभारना है” यक़ीनन 70 के दशक में किसी हिंदी फ़िल्म में इस किस्म का डायलॉग अपने आप में बेहद बोल्ड ही कहा जायेगा लेकिन जब रचने वाला ही सिनेमाई इतिहास का सबसे ‘आवारा’ ‘जोकर’ हो तो क्या कीजै!

 

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पेशावर की पैदाइश और ‘कपूर सरनेम’ लेकर 20 के दशक के आखिर में अपना डेब्यू करने चले इस ‘अनाड़ी’  ने भी अपना मुस्तक़बिल लिखने के लिये दर-बदर की ठोकरें खाई.कहते हैं जब ये ‘आवारा’ शुरूआती दौर में मशहूर निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा को असिस्ट कर था,  सच पूछिये तो असिस्ट भी क्या… दिलीप कुमार की पहली फ़िल्म ज्वार-भाटा में ‘क्लैपर बॉय’ का काम मिला था…

वही क्लैपर बॉय-जिसके जिम्मे सेट पर ‘एक्शन’ बोलते ही फ़िल्म का नाम लिखा खटका ‘खटाक’ करने का काम होता है… केदार के साथ ज्यादा दिनों तक बात जमीं नहीं और आ गया ये  ‘श्री 420’  अपनी धुनी अलग रमाने.लेकिन केदार को भी शायद इस ‘गोपीचन्द  जासूस’ में सिने जगत के भावी शोमैन का अक्स नज़र आ चुका था.

47- वो दौर जब देश अंग्रेजों से आज़ाद हो रहा था और सिनेमा अपने स्थापित बन्धनों से…ऐसे वक़्त में ‘सत्यम शिवम् सुंदरम’ और ‘बरसात’ जैसी क्लसिक्स से इस ‘जोकर’ ने सफलता की एक नई इबारत लिखी. 51 में आई आवारा अपने समय की सबसे बड़ी हिट साबित हुई और  रूस में ‘ब्रदयाग’ के नाम से बड़ी हिट के रूप में जानी गई.कई साल पहले जब हम सुनील शेट्टी-अक्षय कुमार मार्का  फ़िल्में देखते हुए बड़े हो रहे थे तब दूरदर्शन के फिल्मोत्सव में इस ‘आवारा’ की फ़िल्मों की सीरीज़ देखने के बाद ये भ्रम टूटा की पुरानी फिल्में पकाऊ नहीं होतीं( 12-13 की उम्र में  ऐसा भ्रम टूटना बड़ी बात थी).

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उस समय किसी ‘बड़े’ को बताया कि ये राज कपूर वाली पुरानी फिल्में तो बड़ी अच्छी होती हैं (ये परसेप्शन ‘संगम’ के एक गाने का पिक्चराइजेशन देखने के बाद बना था).क्योंकि टीनएज की तरफ बढ़ रहे दूरदर्शन देखने वाली पीढ़ी  के लिए ‘उस तरह का कुछ’ रेत में पानी जैसा ही था.उन ‘बड़े’ का दिया जवाब आज भी ज्यों का त्यों याद है बेटा! पुरानी फिल्में दाल होतीं हैं और राज कपूर की फिल्में ‘दाल फ्राई’.लेकिन ‘कल आज और कल’ और ‘बूट पालिश’ देखने के बाद उन ‘बड़े’ की  वो बात भी गलत साबित निकली.

और कैसे भूल सकते हैं ‘मेरा नाम जोकर– इंडियन सिनेमा की ‘डबल इंटरवल’ वाली ‘दुकलौती’ फ़िल्म जो इस जोकर की सबसे बड़ी असफलता साबित हुई.कहते हैं हिंदी सिनेमा से शंकर-जयकिशन जैसी कालजयी जोड़ी का ‘संगम’ भी इसी ‘राजू’ ने ही कराया था.

कहते हैं अपने अंतिम दिनों में भी ये जादूगर सरहद की बंदिशों से परे इश्क़ की जुनूँ की कथा ‘हिना’ लिख रहा था.

शुक्रिया राज़ साब सिनेमा से तार्रुफ़ कराने के लिए!                                                                                                       

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