बशीर बद्र : जो गुलाब की पंखुड़ियों से पत्थर कुरेदने का फ़न जानते हैं

एक शायर की शायरी ही नहीं बल्कि उसकी ज़िंदगी भी उस आम अवाम की होती है जो उसे जीना चाहते हैं. इस बार आखर- माला  में हम आपको रूबरू कराने जा रहे बशीर बद्र साहब से 

1984 में दंगाइयों ने मेरठ में बशीर जी के घर को आग लगा दी.इससे सिर्फ बशीर बद्र ही आहत नहीं हुए बल्कि एक शायर की संवेदना भी घायल हुई,तब उन्होंने एक पँक्ति कही जिसे आज भी लोग आहत होने पर अक्सर दोहराते नज़र आते हैं-

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

इस घटना के बाद बशीर साहब मेरठ छोड़कर भोपाल में रहने लगे थे. इस वाकये से बशीर साहब की कहानी इसलिए शुरू कर रहा ताकि एक शायर के शब्दों के पीछे छिपे दर्द को समझने की कोशिश में कुछ मदद मिले,क्योंकि शायरी केवल शब्द जाल नहीं बल्कि अनुभवों का अक्स होता है जिसे शायर काग़ज़ों पर उकेर देता है.

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बशीर साहब कहते हैं कि-

हज़ारों शेर मेरे सो गये काग़ज़ की क़ब्रों में

अजब माँ हूँ कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता

डॉ॰ बशीर बद्र का जन्म 15 फ़रवरी 1936 को हुआ. इश्क और दर्द गाने वाले इस शायर को हम  किसी एक भाषा के ढांचे में इसलिए नहीं रख सकते क्योंकि ये खुद कहते थे कि-

“ग़ज़ल न तो उर्दू न फ़ारसी न अरबी और न हिन्दी की बपौती है ग़ज़ल तो उस ज़ुबान को अपने अन्दर समो लेती है जिसे भीख मांगने वाला भी समझे और भीख देने वाला भी

अब ऐसे में हम कह सकते हैं कि बशीर साहब हर उस ज़ुबान के शायर थे जहाँ मोहब्बत और दर्द की गुँजाइश बनी रहती हो.

जब 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौता हुआ और और इसके दूसरे दिन के अख़बारों में पकिस्तान के वजीरे- आज़म ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो और तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की एक तस्वीर छपी जिसमें वे हाथ मिलाते नज़र आ रहे थे.  और उसके नीचे एक शे’र लिखा था जिसे भुट्टो साहब ने श्रीमती इंदिरा गाँधी को समझौते के समय सुनाया था-

दुश्मनी जम के करो लेकिन ये गुंजाईश रहे

 जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हो

जब भुट्टो ने ये पँक्ति लाहौर के एक अख़बार में पढ़ा था उसी दिन से अदब की दुनिया में ये नाम सीमाओं के बंधन से मुक्त हो गया, मशहूर हो गया उस समय बशीर बद्र अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे थे.

बशीर बद्र का पहला ग़ज़ल संग्रह “इकाई” उर्दू में 1969 में आया ,दूसरा संग्रह “इमेज “1973 में और तीसरा “आमद”1986 में “आसमान” 1990 में और “आहट ” 1994 में आया. फिर 1999 में “आस” को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला.

बशीर साहब  को साहित्य और नाटक अकादमी में दिए गये योगदानो के लिए 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. लेकिन बशीर साहब का दायरा किसी पुरस्कार की परिधि के भीतर कैद कर नहीं देखा जा सकता.

उन्हें देखा जाना चाहिए उनकी अमुल्य कृतियों के झरोखों से-

हम भी दरिया है हमे अपना हुनर मालूम है

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

ज़िन्दगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं

पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है

कुछ तो मजबूरियाँ रहीं होंगी

यूँ कोई बे-वफ़ा नहीं होता

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना

जहाँ दरिया समन्दर से मिला ,दरिया नहीं रहता

शौहरत की बलंदी भी पल भर का तमाशा है

जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो

बस गई है मेरे एहसास में ये कैसी महक

कोई ख़ुश्बू मैं लगाऊं तेरी ख़ुश्बू आए.

 

 

कभी तो आसमाँ से चांद उतरे जाम हो जाये

तुम्हारे नाम की इक ख़ूबसूरत शाम हो जाये
हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाये

चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाये


अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर 

मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाये


समंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको

हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाये


मैं ख़ुद भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई मासूम क्यों मेरे लिये बदनाम हो जाये


मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा

परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाये


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये

 

कहीं चांद राहों में खो गया कहीं चांदनी भी भटक गई

मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई

 

मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में

मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई

 

कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले

न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई

 

मुझे पदने वाला पढ़े भी क्या मुझे लिखने वाला लिखे भी क्या

जहाँ नाम मेरा लिखा गया वहां रोशनाई उलट गई

 

तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी क़ामयाब न हो सकीं

तेरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई

 

bashir-shayri

 

ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में

माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में

 

तुम छत पे नहीं आये वो घर से नहीं निकला

ये चाँद बहुत लटका सावन की घटाओं में

 

इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी

फूलों की बदन वाली ख़ुशबू-सी अदाओं में

 

दुनिया की तरह वो भी हँसते हैं मुहब्बत पर

डूबे हुए रहते थे जो लोग वफ़ाओं में

 

 चंद शे’र

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये.

 

ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से कम दी है ज़मीं

पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है.

 

जी बहुत चाहता है सच बोलें

क्या करें हौसला नहीं होता.

 

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों.

 

एक दिन तुझ से मिलनें ज़रूर आऊँगा

ज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये.

 

इतनी मिलती है मेरी गज़लों से सूरत तेरी

लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे.

 

वो ज़ाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा है

कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे.

 

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलानें में.

 

पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,

आँखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते.

 

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था.

फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला.

 

मैं इतना बदमुआश नहीं यानि खुल के बैठ

चुभने लगी है धूप तो स्वेटर उतार दे.

 

 

 

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