डियर सहवाग! बाउंड्री के पार पहुंची हर गेंद छक्का नहीं होती

समाज के प्रति एक खिलाड़ी की ज़िम्मेदारी के प्रकाश में विरेन्द्र सहवाग  के चौकों-छक्कों की सर्जिकल स्ट्राइक कर रहे हैं नवीन नेगी

भारत और श्रीलंका के बीच दांबुला में मैच खेला जा रहा था, भारत को जीत के लिए 1 रन की जरूरत थी और सहवाग 99 रन पर खेल रहे थे. यानी भारत की जीत और सहवाग के शतक में सिर्फ 1 रन का फासला था. गेंदबाज सूरज रणदीव ने गेंद डाली, सहवाग अपने जाने-पहचाने अंदाज में बाहर निकल आए और गेंद को बाउंड्री के पार पहुंचा दिया. भारत मैच जीत चुका था…लेकिन यह क्या सहवाग का शतक अधूरा ही था, अंपायर ने गेंद को नो बॉल करार दिया. मतलब गेंद के बाउंड्री पार पहुंचने के बाद भी वह छह रन सहवाग को नहीं मिले. भारत नो-बॉल के अतिरिक्त रन से मैच जीत गया और सहवाग शतक से चूक गए.

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क्रिकेट की पिच से बाहर निकलकर सहवाग ट्विटर पर भी खूब छक्के उड़ा रहे हैं. उनके फॉलोवर्स इसका मजा भी ले रहे हैं. लेकिन गुरमेहर कौर का जिस अंदाज में सहवाग ने मजाक बनाया, वह दिखाता है कि वे एक बार फिर भूल गए हैं कि कई बार गेंद बाउंड्री पार जाने पर भी उन्हे छह रन नहीं दिलाती.

सहवाग से सहमत हुआ जा सकता है कि उनके द्वारा बनाए गए दो तिहरे शतक उनके बल्ले से नहीं बल्कि उनकी काबिलियत की वजह से थे. लेकिन गुरमेहर ने जितने बड़े दिल के साथ यह बात कही थी कि उनके पिता की मौत पाकिस्तान की वजह से नहीं बल्कि युद्ध की वजह से हुई थी.उसका मजाक तो हरगिज़ नहीं बनाया जा सकता. कोई अपने बेहद करीबी को खोने के बाद भी बदला लेने की जगह शांति का संदेश देने की हिम्मत रखे, तो क्या उसे इस तरह ट्रोल किया जाए.

सहवाग ने एक बार कहा था कि शोएब अख्तर उन्हें बाउंसर पे बाउंसर मार रहे थे, अगले ओवर में सचिन ने अख्तर की बाउंसर पर छक्का जड़ा तो सहवाग ने अख्तर से कहा ‘बाप-बाप होता है, बेटा-बेटा होता है’. यह कहानी कितनी सच है या झूठ हमें नहीं मालूम लेकिन फिर भी हमें इसे सुनकर बड़ा गर्व-सा महसूस होता है. लेकिन सहवाग, गुरमेहर ने तो हकीकत में अपने बाप को खोया है, वह भी उसी पाकिस्तान से लड़ते हुए. फिर भी वह युद्ध की तरफ नहीं शांति की तरफ खड़ी है.

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रामजस कॉलेज में घटी घटना के अपने-अपने पक्ष हो सकते हैं, लेफ्ट या राईट विंग कोई भी आज के समय में दूध का धुला तो हरगिज नहीं. सहवाग और गुरमेहर के भी अपने-अपने विंग हो सकते हैं. लेकिन इन सबके बीच किसी संगठन द्वारा एक लड़की को रेप की धमकी देना कितना जायज़ है, समझ से परे है. विरोध का कौन सा तरीका ज्यादा सही है-तख्ती लेकर कुछ लिखना या फिर चेहरे पर लात-घूंसे चलाना, यह हमारे और आपके विवेक पर निर्भर करता है.

सहवाग का किसी ट्रोल की तरह व्यवहार करना उनके फॉलोवर्स की संख्या बढ़ा सकता है और बढ़ा भी रहा है. उनका अपने एक ट्वीट में यह कहना कि ‘पति सिर्फ काम करने के लिए बने हैं और बीवियां सिर्फ शॉपिंग के लिए’ कई लोगों को सिर्फ एक मजाक लग सकता है और लगा भी  है. लेकिन सहवाग यह भूल जाते हैं कि ट्विटर की पिच पर ऐसी कई गेंदे नो-बॉल होती हैं, जिन पर आपके लगाए छक्के बेमानी हो जाते हैं, फिर आपके फॉलोवर्स चाहे आपकी जीत पर तिरंगा कितना भी ऊंचा क्यों ना उठाते फिरें. लेकिन अफसोस यहां कोई अंपायर नहीं होता जो सहवाग को वह नो-बॉल दिखा सके, यहां तो रणदीप हुड्डा जैसे दोस्त होते हैं, जो सिर्फ तालियां बजा सकते हैं.

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