क्यों ‘इश्क में शहर होना’ आसान है मगर ‘इश्क में गाँव होना’ मुश्किल?

क्यों कोई इश्क में गाँव नहीं होता? क्यों कोई इश्क में घर नहीं होता… बता रहे हैं रजनीश वत्स

 

जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है

आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है…

village

“इश्क में शहर होना” बहुत ही लाजवाब टाइटल है, पर शहर क्यों हुए कोई गाँव हो जाते? क्या आपको शहर की रुमानियत और रंगीनियत ज्यादा पसंद है?  एक पत्रकार को दूसरा पत्रकार ऐसा पूछता ! कितना बढ़िया होता आप गाँव हो जाते. गाँव होना बुरा है क्या ? हाँ , बुरा है क्योंकि गांव में सड़कें कहाँ हैं जो इश्क को मीलों का रास्ता बता सके. इश्क में कोई कस्बा भी तो हो सकते थे आप, वहाँ तो सड़कें होती हैं. पत्रकार फिर पूछता… कस्बे में बिजली नहीं होती, और अँधेरे का इश्क कोई इश्क है भला? दूसरा पत्रकार जबाब देता.

SANYO DIGITAL CAMERA

 

इश्क तो एक सौदा है , और शहर में ये आसानी से बिक सकता है , और इस सौदे में बड़ा मुनाफा भी है. मुझे ही देखिये जब इश्क में शहर हुआ तो भाई की टिकट पक्की हो गई. राष्ट्रीय स्तर का नेता बन गया. यहाँ तक कि मैं भले लोगों की नब्ज पहचानता रहा पर अपनी नब्ज भूल गया. फिर आपको तो पहले इश्क में घर होना चाहिए था. इश्क में घर होते तो कम से कम घर की कलाई तो पकड़ते ? ये इतना आसान नहीं है मेरे भाई… इश्क में शहर होना आसान चीज है, वहां आप किसी पर भी फब्ती कस सकते हैं, किसी के दामन पर कीचड़ उछाल सकते हैं, शहर में आपको पहचानने वाला कोई नहीं होता. शहर में आप जम के अपना धंधा चला सकते हैं परंतु जैसे ही आप इश्क में घर होते हैं, आपकी नसें दुखने लगती हैं, आपको अपना खून अपना कहने को दौड़ता है फिर आप इश्क में घर कैसे हो सकते हैं, इश्क में शहर होना एक कला है , आप एक अच्छा नाटक खेल सकते हैं, अपने अंदर के जानवर को इंसान बना सकते हैं, रंग बदल सकते हैं पर घर में ना बाबा ना ! घर में तो आपको रग रग से लोग जानते हैं, आप इश्क में घर नहीं हो सकते.

 

OLYMPUS DIGITAL CAMERA

 

घर में मां-बहने होती हैं, परिवार होता है, समाज होता है , आप भला इश्क में घर कैसे हो सकते हैं ? लज्जा नहीं आएगी क्या ? शर्म नहीं आएगा क्या ? इश्क नहीं आसान इतना समझ लीजो.. इश्क में आप बेखबर भी हो जाएं तो कोई बात नहीं ! घर नहीं हो सकते बस.

पर यदि आप इश्क में घर ही हो जाते तो आपका घर सुरक्षित रहता. ढीठ पत्रकार फिर सवाल करता .

अपने घर को कौन देखता है, वो तो सुरक्षित है ही. हमें तो शहरों को देखना है, जहाँ सुंदर सुंदर खबरें होती हैं, जहाँ से खबरें निकलती हैं, खबरें नहीं निकले तो बनानी पड़ती हैं, अपने घर में खबर नहीं होती. भूल चूक से कोई खबर मिल भी जाए तो उसे अचार के डब्बे में डाल देना चाहिये , सूखने के लिये व शहरों की खबरों पर स्क्रीन काली करना चाहिए. इसलिये हम इश्क में घर नहीं शहर होना चाहिए.

सवाल करने वाला पत्रकार बस आहें भरता – काश ! आप इश्क में घर हो गए होते ?

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s