अफ़सोस और आश्चर्य दोनों होता है कि 70 सालों में इन ‘गधों’ का मुद्दा क्यों नहीं उठ पाया?

गधों के बहाने वर्तमान विसंगतियों पर प्रकाश डाल रहे हैं लेखक रजनीश वत्स

गधे इस धरती के सबसे इनोसेंट प्राणी हैं, सबसे ईमानदार, मेहनती और सीधे-सादे. बिल्कुल सुदूर पूरब में गंगा किनारे टाल में काम करते किसान की तरह. जितना फसल उगे, काम चला लिया. गंगा मैया सारी फसल बहा भी ले गई तब भी काम चला लिया. सारी फसल उगने पर सही दाम नहीं मिला तब भी काम चला लिया. कभी उफ्फ तक नहीं करता. ना धरना -प्रदर्शन , ना विरोध और ना ही किसी तरह का राजनैतिक अहंकार कि हम वोट बैंक हैं, रात दिन काम करना इनका भी शगल है , सब्सिडी मिले या ना मिले, गैस का कनेक्शन घर में हो या ना हो , ये काम करते हैं बस ठीक वैसे ही , जस का तस गधों की भी यही स्थिति है.donkey-ji

बिना प्रचार, विज्ञापन के ये भी दिन रात काम में लगे रहते हैं, कभी ये भी नहीं कहते कि बोझा भारी ज्यादा है , थोड़ा कम कर दो. ना ही आजतक किसी ने इस प्राणी की ज्यादा चर्चा की है, इसे भी अपना हाल पर छोड़ रखा है पर बात बढ़ उस समय गई जब चुनावी मौसम में गधा राष्ट्रीय मुद्दा बन गया.

मुद्दों का क्या? कुछ भी मुद्दा बन सकता है मसलन आपने सर्दी में गर्मी कपड़े क्यों पहने! ये भी एक चुनावी मुद्दा हो सकता है, पर इतने छोटे मुद्दे नहीं उठते , देश के सबसे बड़े राज्य में चुनाव है सो मुद्दा भी बड़ा होना चाहिये , अब गधे से बड़ा मुद्दा क्या हो सकता है देश में. जिस देश की आधी आबादी गधों से भी बदतर जीवन जी रही हो. जिस देश को चलाने के लिये हम रोज गधों का प्रोडक्शन कर रहे हों उनके लिए राष्ट्रीय मुद्दा गधा ही होना चाहिए. मुझे तो अफ़सोस और आश्चर्य दोनों होता है कि 70 सालों में ये मुद्दा क्यों नहीं उठा. ये मुद्दा तो आपातकाल में उठना चाहिए था, इस मुद्दे के द्वारा तो हम चाइना से युद्ध जीत सकते थे , खैर ! कोई बात नहीं , देर आयद-दुरुस्त आयद. आज ही उठा तो क्या हुआ मुद्दा तो उठा.

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सहृदय धन्यवाद , उस युवा नेता का जिन्होंने गधों को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया. गधा आधी आबादी का प्रतीक है, और उस आधी आबादी की बात करने वाला भी गधा ही होना चाहिए. अब तो गधे की समस्या पर राष्ट्रीय बहस हो. सेमीनार आयोजित होने चाहिए, चैनल में कॉफ़ी पीते हुए पैनल कितने सुंदर दिखेंगे जब वे गधों की समस्या पर राष्ट्रीय बहस करेंगे. जरा उस महिला एंकर की सुंदरता और वाकपटुता की कल्पना कीजिये जो डेस्क पर बैठकर ये सवाल पूछेंगी कि आखिर गधों को आज तक दरकिनार क्यों रखा गया राजनीति से?

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कल इस ज्वलन्त मुद्दे के उठने के बाद मैंने एक गधों की बस्ती का भ्रमण किया. उनके विचार जानना हमारा हक है तभी तो इस मुद्दे को व्यापक बना सकते हैं हम. गधों की बस्ती में इंसान भी रहते थे, पर मुझे गधे ज्यादा संतुष्ट दिखे, काम करते हुए, परिश्रम करते हुए, बहुत सारे बेरोजगार इंसान नजर आये परन्तु कोई गधा बेरोजगार नजर नहीं आया. हर किसी की पीठ पर कोई ना कोई बोझा जरूर था. मल्लब रोजगार के मामले में गधे इंसानों से बहुत आगे हैं. गधे काम करते हैं, उन्हें काम से कभी तकलीफ नहीं हुई , तभी तो उन्हें काम भी मिलता है, वो बेकार के राष्ट्रीय मुद्दे नहीं खड़ा करते, वे टीवी नहीं देखते, वे वोट नहीं करते, उन्हें लोकतंत्र से मतलब नहीं है, ये रहे या भाड़ में जाए कोई मतलब   नहीं.राजतंत्र में भी वे इतना ही काम करते थे जितना लोकतंत्र में कर रहे हैं. शासक टीपू हो या पप्पू उसे कोई तकलीफ नहीं होती. घास खाने को मिले या रोटी दोनों खा लेंगे वो. सर्दी हो या गर्मी वो उन्हें जैकेट , स्वेटर, एसी नहीं चाहिए. सुविधाओं से उन्हें ज्यादा मल्लब नहीं तभी तो वे गधे हैं,औऱ सदा रहेंगे..

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