काश जयललिता का कोई पुत्र होता…

बकलोल दुनिया बिना बेटे के कैसे बेतरतीब हो जाती है,ये बता रहे हैं लेखक रजनीश वत्स

पुत्रों का बड़ा महत्व होता है जीवन में. पुत्र के बिना इस जीवन का क्या परलोक की कल्पना भी नहीं की जा सकती. हमारे ग्रंथों में भी वृहद रूप से वर्णित है कि पुत्र के बिना मोक्ष नहीं मिल सकती. मल्लब मोक्ष की प्राप्ति के लिये पुत्र आवश्यक वस्तु है. अगर आप गृहस्थ जीवन में हैं तो पुत्र प्राप्ति को मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, इसके अलावा वंश परम्परा को चलाने के लिये पुत्र अत्यंत जरूरी है, पुत्र प्राप्ति के लिये योग-जोग-भोग यहाँ तक कि निरोग रहने के तमाम आवश्यक उपाय किए जाते हैं. जिनके लगातार प्रयास के बाद भी पुत्र पैदा नहीं हुआ वे ऐसे निराश होते हैं जैसे यमराज समय से पहले ले जाने को आये हों. पुत्र प्राप्ति के लिये तो कई लोग बच्चों की लाइन तक लगा देते हैं, 8 बेटियां पैदा हो जाए परंतु 9वें पुत्र की चाहत में सतत परिश्रम में लगे रहते हैं, चलो इसी बहाने लड़कियों का अनुपात तो बढ़ता है परन्तु आजकल एक ट्रेंड चला है, नया तो नहीं है परंतु नए रूप में है , पुत्र नामक पशु अब ना सिर्फ पूर्वजो की सम्पत्ति का स्वामी बन रहा है, ना सिर्फ परलोक के मोक्ष का स्रोत बन रहा है बल्कि भूलोक में भी उम्र बढ़ाने का सबसे अच्छा व सफल माध्यम है. राजनैतिक विरासत को बढ़ाने के लिये जीवन में पुत्र योग का होना आगे के ग्रंथों में आवश्यक माना जाएगा. आप राजनीति के बड़े सितारे रहे हों , आपने राजनीति में वो किया है जिसकी जनता को इंतजार था परंतु यदि आपने एक लुच्चा सा भी पुत्र पैदा नहीं किया और यदि किआ और उसे राजनीति में नहीं घसीटे तो आप से घटिया राजनैतिक व्यक्ति इस नहीं पैदा हुआ है इस देश में.

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पुत्रों का राजनीति में बड़ा महत्त्व है. मसलन यदि आपने चारा खा लिया , वो भी करोड़ों का फिर उस चारे चोरी में आपको जेल हो गई फिर आपकी राजनीतिक विरासत को कौन संभालेगा. कौन आपके बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेगा? माना कि आपके सक्रिय राजनैतिक जीवन में ही आपको हार्ट अटैक आ जाए फिर आपके बाद कौन आपके पद की शपथ लेंगा ? आपके पास एक बिजनस मैन या फिर पायलट या फिर क्रिकेटर या फिर कमेडियन या फिर ऐरा-गैरा किसी तरह का बकलोल कम से कम एक एक पुत्र तो होना ही चाहिये जिसको आपके तुरंत बाद शपथ दिलाया जा सके. स्वर्गीय सुश्री जयललिता को कुछ दिन पहले ईश्वर ने  याद कर लिया , आज तमिलनाडु पनीर व पलनी के चक्कर में ऐसे फंसा है कि उनके सारे विकास कार्य पीछे रह गए. आज उनका कोई पुत्र होता तो ऐसी विकट स्थिति कभी आती ? नहीं ना, अब मुलायम जी को ही देखिये उनकी समाजवादी परम्परा को किस ऊँचे स्तर पर जाकर अखिलेश ने संभाला है , नेता जी ने तो जनता को झुनझुना दिया था, उनके पुत्र ने तो नेता जी को ढोलक थमा दिया. ऐसे पुत्र बड़े लगन से प्राप्त होते हैं. अखिलेश के लिये नेता जी ने कितनी कुर्बानियां दी होंगी , बगैर जेल गए, बिना यमराज के दर्शन के ही पुत्र आपकी राजनैतिक विरासत सम्भाल ले इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है! सोनिया जी तो अपने पुत्र को विरासत थमाने के लिये बेचैन हैं, उनकी जैसी कठोर तपस्विनी मां जो दिन रात मेहनत कर रही हैं, नमन् है उनको.

राजनीतिक विरासत देश के बकलोल युवा तो सम्भाल नहीं सकते. उनको तो नौकरी करनी है, बीबी बच्चे पालने हैं , बूढ़े माँ बाप की सेवा करनी है, ज्यादा हुआ तो मॉल में शॉपिंग कर लेंगे , उससे ज्यादा हुआ तो ऋषिकेश, वृंदावन में श्रवण कुमार बनकर घुमा देंगे बूढ़े माँ बाप को. जुआ भी खेल सकते हैं, क्रिकेट मैच देख सकते हैं, टीवी पर बहस देख लेंगे और वोट के दिन वोट दे देंगे. राजनीति तो राजनैतिक लोगों के पुत्रों का अधिकार है. शेर का बेटा ही शेर हो सकता है, हाँ गीदड़ भी मान लीजिये तो उसका बेटा गीदड़ ही होगा.

हम तो शेर, गीदड़ की औलाद नहीं हम तो 125 करोड़ भूखे नंगो की जमात हैं, हमारे बस में राजनीति नहीं. वो तो खून से होती है. जैसे दुर्योधन के खून में ही राजनीति था भले वो अंधे की संतान ही क्यों ना था.
है ना ?

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