यह कैसा झोल है कि एग्जिट पोल या ओपिनियन पोल अब ‘ओपिनियन मेकर’ बनना चाह रहे हैं?

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कहा जाता है कि कई न्यूज़ चैनल और अखबार तो सिर्फ ‘ओपिनियन पोल’ और ‘एग्जिट पोल’ के पेट्रोल से ही फर्राटे भर पाते हैं. चुनाव के मौसम में आपका सामना भी इन दो शब्दों से ज़रूर हुआ होगा. विकिपीडिया बताता है कि ओपिनियन पोल चुनावों से पहले किया जाता है, जिससे लोगों की चुनाव से जुड़े विषयों पर राय ली जा सके.वहीं एग्जिट पोल  वोट डाले जाने के तुरंत बाद किया जाता है, जिसमें राजनीतिक पार्टियों और उनके उम्मीदवारों को मिले समर्थन का अनुमान लगाया जाता है. कुलमिलाकर इन दोनों शब्दों का मतलब मतदाताओं का मूड बताना है लेकिन इस पर विवाद तब खड़ा होता है जब ये राजनीतिक पार्टियों के मूड के हिसाब से मतदाताओं के मूड को प्रभावित करने लगते हैं.  

अभी हाल ही में रिसोर्स डिवेलपमेंट इंटरनैशनल प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी द्वारा उत्तरप्रदेश में संपन्न हुए पहले चरण के चुनाव पर कराए गए एग्जिट पोल को दैनिक जागरण अखबार की वेबसाइट पर प्रकाशित कर दिया   जिसे चुनाव  आयोग ने गंभीरता से लेते हुए तुरंत एफआईआर कराने के निर्देश दिए. दरअसलचुनाव आयोग द्वारा जारी निर्देश के मुताबिक जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत आयोग द्वारा तय अवधि के दौरान किसी भी प्रकार के एग्जिट पोल का संचालन और प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा इसका प्रकाशन या प्रचार या किसी भी अन्य तरीके से उसका प्रसार प्रतिबंधित रहता है. लेकिन पेट्रोल के चक्कर में ऐसा वाकया हो जाता है.

आमतौर पर सारे लोकतांत्रिक देशों में एग्जिट पोल होते हैं,  1967 में पहली बार नीदरलैंड में एग्जिट पोल किए गए थे, जो लगभग बीस सालों तक चलता रहा रहे, उसके बाद शिकायत आम होने लगी कि चुनाव पूरे होने के पहले एग्जिट पोल के सार्वजनिक हो जाने से उन जगहों पर मतदान प्रभावित होता है, जहां तब तक मतदान नहीं हुआ है, उसके बाद सारे ही देशों ने चुनाव पूरे होने तक एग्जिट पोल के प्रसारण पर पाबंदी लगा दी.

हिंदूस्तान लिखता है कि ‘’भारत में, शुरू में तो मार्केटिंग रिसर्च के तरीकों को ही अपनाकर चुनावी सर्वेक्षण किए जाते थे, मगर धीरे-धीरे अपनी गलतियों से सीखकर तमाम सर्वेक्षणकर्ता बेहतर तरीके अपनाने की कोशिश कर रहे हैं. समस्या यह भी है कि हमारे यहां वोटरों के वोटिंग के रुझान भी बदल रहे हैं. अमेरिका या ब्रिटेन में लोकतंत्र का स्वरूप लंबे वक्त से स्थिर है, इसलिए वहां इस कार्य में अपेक्षाकृत आसानी है. और कुछ नहीं, तो चुनावी अटकलबाजी में एग्जिट पोल काफी उपयोगी होते हैं, फिर भारत में चुनाव सरकार चुनने की कवायद नहीं, बल्कि महोत्सव ही होते हैं. जब राजनीतिक विश्लेषक, ज्योतिषी, राजनेता और सटोरिये तक इस उत्सव में भाग ले सकते हैं, तो एग्जिट पोल करने-करवाने वालों को क्यों रोका जाए?’’

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ये तो हुई एग्जिट पोल की बात लेकिन औपिनियन पोल में भी बहुत झोल होता है.  ओपिनियन पोल के लिए ये भी कहा जाता है कि ओपिनियन पोल पोल ना होकर ओपिनियन मेकर बनकर मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास करता है. भारत में पहली बार पहली बार चुनाव आयोग ने 22-23 दिसंबर 1997 को एग्जिट और ओपिनियन पोल्स पर राजनैतिक पार्टियों से बैठक की थी. उस समय एमएस गिल मुख्य चुनाव आयुक्त थे. इस बैठक में अधिकतर राष्ट्रीय और राज्यों की पार्टियों ने कहा था कि यह पोल्स अवैज्ञानिक हैं और इनकी प्रकृति और आकार के साथ भेदभाव किया गया है.

इसके बाद 11 जनवरी, 1998 को लोकसभा चुनाव सहित गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव हुए. जिसके बाद चुनाव आयोग ने 14 फरवरी और 7 मार्च को आर्टिकल 324 के तहत गाइडलाइंस जारी कर अखबारों, न्यूज चैनलों पर एग्जिट और ओपिनियन पोल्स छापने या दिखाने पर पाबंदी लगा दिया. इन चुनावों में पहले चरण की वोटिंग 16 फरवरी और आखिरी चरण की 7 मार्च 1998 को होनी थी. चुनाव आयोग ने यह भी कहा था कि अगर अखबार और न्यूज चैनल एग्जिट और ओपिनियन पोल्स छाप रहे हैं तो उन्हें मतदाताओं के सैंपल साइज, मतदान पद्धति, गलती की संभावना और पोलिंग एजेंसी के बैकग्राउंड के ब्योरे का खुलासा भी करना चाहिए.

इस गाइडलाइंस का प्रेस और मीडिया ने जमकर विरोध किया,उनका तर्क था कि इससे अभिव्यक्ति की आज़ादी का उल्लंघन होता है.फिर चुनाव आयोग के निर्देश को सर्वोच्च न्यायालय और दिल्ली व राजस्थान उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी. यह याचिका फ्रंटलाइन के तत्कालीन संपादक एन.राम, तमिल के साप्ताहिक अखबार नक्कीरन के संपादक आर राजगोपाल और राजस्थान के एसएन तिवारी ने दायर की थीं. सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत इस मामले को सुना, लेकिन आयोग की गाइडलाइंस पर रोक नहीं लगाया. इस वज़ह से केवल 1998 के लोकसभा चुनावों में ही एक महीने तक एग्जिट और ओपिनियन पोल्स पर पाबंदी लगी रही थी.

इसके बाद साल 2004 में चुनाव आयोग इसी मुद्दे पर 6 राष्ट्रीय पार्टियों और 18 राज्य पार्टियों के समर्थन के साथ कानून मंत्रालय के पास पहुंचा. आयोग का कहना था  कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन किया जाना चाहिए और आयोग द्वारा तय एक समय के दौरान एग्जिट और ओपिनियन पोल्स पर रोक लगाई जानी चाहिए.फिर इन सिफारिशों को मानते हुए फरवरी 2010 में सिर्फ एग्जिट पोल्स पर पाबंदी लगा दी गई. इसके बाद नवंबर 2013 में चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों से विचार विमर्श कर कहा कि वह ओपिनियन पोल्स पर पाबंदी लगाने की अपनी मांग को फिर से उठाएं.

कांग्रेस ने जहां ओपिनियन पोल को ‘गोरखधंधा’, ‘तमाशा’ और ‘मनगढंत’ करार देते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने की जोरदार वकालत करती रही  है वहीं भाजपा  कहता है कि ‘’ऐसा करना न तो संवैधानिक रूप से स्वीकृति योग्य है, न ही वांछनीय है क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है.’’pol3

तब तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने अलग से कहा कि ओपिनियन पोल कई बार मनगढ़ंत होते हैं इसलिए, पार्टी ने उसका विरोध कर अच्छा ही किया है. उन्होंने कहा, ‘‘यदि असली ओपिनियन पोल हों तो किसी को दिक्कत नहीं है लेकिन अब हमें जिस तरह की खबरें मिल रही है, उससे पता चलता है कि वे मनगढ़ंत होते हैं. सभी लोग ओपिनियन पोल लेकर सामने आ रहे हैं.’

वहीं अरूण जेटली ने भाजपा की ओर से जारी एक आलेख में कहा, ‘‘ओपिनियन पोल हो रहे हैं. कुछ ने विश्वसनीयता हासिल कर ली है जबकि कुछ को आसानी से नजरअंदाज किया जा सकता है. इन पोल की विश्वसनीयता हो या नहीं, क्या इन्हें प्रतिबंधित किया जा सकता है.’’उन्होंने कहा कि ‘’राजनीतिक दल तब इन ओपिनियन पोल को खारिज करने की मांग करते हैं जब वे उनके प्रतिकूल होते हैं. सामान्यत: नुकसान में रहने वाला प्रतिबंध की मांग करता है जबकि फायदे में रहने वाला उसे जारी रखने में पक्ष में होता है.जेटली ने कहा, ‘‘ऐसे पोल पर प्रतिबंध पर इस आधार पर नहीं विचार किया जा सकता है कि कौन ऐसी मांग उठा रहा है. स्पष्ट तौर पर (ओपिनियन) पोल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंग है। उनपर प्रतिबंध लगाना न तो संवैधानिक रूप से इजाजत योग्य है न ही वांछनीय.’’

वैश्विक तौर पर हम बात करें तो 16 यूरोपीय संघ के देशों में पूरे महीने और मतदान के दिन से 24 घंटे पहले तक ओपनियन पोल्स की रिपोर्टिंग करने पर रोक है. सिर्फ इटली, स्लोवाकिया और लग्जमबर्ग में 7 दिन से ज्यादा का बैन है. वहीं ब्रिटेन में ओपिनियन पोल्स छापने पर कोई बैन नहीं है, लेकिन वोटिंग खत्म होने तक एग्जिट पोल्स नहीं छापे जा सकते. वहीं अमेरिका में भी ओपिनियन पोल्स का मीडिया कवरेज चुनावों का अभिन्न अंग माना जाता है.

इस पर व्याप्त संदेह और आंकलन की सच्चाई उदाहरणों से देखें तब पता चलता है कि साल 2004 में सर्वे एजेंसियों के अनुसार भाजपा की सरकार इण्डिया शाइनिंग के नारे के साथ सरकार बना रही है लेकिन परिणाम एकदम उलट आया. वैसे ही 2007 में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में ओपिनियन और एक्जिट पोल में भाजपा को 92-100 सीटें, जबकि कांग्रेस को 77-85 सीटें बता रहे थे लेकिन भाजपा इस दौरान 120 सीटें मिली थी.2012 में हुए उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में सर्वे एजेंसियों ने समाजवादी पार्टी को 127 से 135 सीटें बताई थी, जबकि उन्हें 224 सीटें मिलीं जो कि सर्वे से कहीं ज्यादा थीं. ऐसे कितनों ही उदाहरण मिलते हैं जिससे यह आंकलन गलत साबित होता रहा है. ये कहने का मतलब कतई नहीं है कि यो पोल बिल्कुल गलत होते हैं. दरअसल मानवीय प्रवृत्ति हमेशा बदलती रहती है और इसकी माप और आकार भारत के परिप्रेक्ष्य काफी असमान है इसके अलावा इनके गलत होने या मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश के पीछे इनका स्वार्थगत  पूर्वाग्रह होता है. कुलमिलाकर इंसानी नियत की वजह से ये शब्द अपने मायने खोते जा रहे हैं.

 

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