आखिर क्यों ‘चावल वाले बाबा’ को ‘दारू वाले बाबा’ बनना पड़ रहा है?

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ऐसे तो ‘शराब’ और ‘चावल’ का रिश्ता काफी पुराना है छत्तीसगढ़,ओड़िशा और झारखण्ड जैसे राज्यों के बहुतायत लोग  चावल से बनाई जाने वाली ‘हडिया’ पीते रहे हैं, लेकिन अब ‘चावल वाले बाबा’ के नाम से मशहूर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह चावल और शराब के इस संबंध को और भी मजबूती देने जा रहे हैं.अब वे ‘चावल वाले बाबा’ से ‘दारू वाले बाबा’ बनने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं.ये मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि ये सोशल मीडिया पर एक्टिव छत्तीसगढ़ की जनता बोल रही है.

आखिर क्या वज़ह है कि जनता उन्हें इस नए नाम से विभूषित करने की सोच रही है…ये तो हम आगे बताएंगे ही, लेकिन इससे पहले हम आपको बताएंगे कि किस तरह चावल और शराब की मांग पूर्ति में एक नए किस्म का आर्थिक संबंध भी देखने को मिला है.rice-wine

जनवरी 2008 में जब गरीबों को तीन रुपये में 35 किलो चावल दिये जाने की योजना शुरू हुई उसके बाद राज्य में शराब की बिक्री में एकाएक उछाल आया.आंकड़ो के हिसाब से 2008-09 में आबकारी विभाग को 965.05 करोड़ रुपए की आय होती थी. जो 2010-11 में 1188.32 करोड़ रुपये हो गई. इसके बाद 2011-12 में इस आय में बड़ा उछाल आया और यह 1624.35 पहुंच गई. लेकिन इसके बाद के साल का आंकड़ा और चौंकाने वाला था. राज्य सरकार के अनुसार 2012-13 में आबकारी आय 2485.73 करोड़ जा पहुंची. तब पुरी पीठ के शंकराचार्य ने कहा था कि निश्च्छलानंद सरस्वती ने कहा था कि “एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से 35 किलो चावल देने के कारण कोई काम नहीं करना चाह रहा है. मज़दूरी महंगी हो गई है, विकास का काम ठप्प पड़ गया है और लोग शराबी बन गए. सस्ता अनाज को बंद करना चाहिये और शराब की बिक्री भी.”

खैर ये दोनों की बिक्री अब तक बंद नहीं हुई बल्कि इनकी दुकानों का संचालन जो अलग-अलग मालिक यानी सरकार और नीजी हाथों में था उसे एक ही मालिक को सौंपने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है.यानी आप सरकारी दुकानों से चावल और मदिरा दोनों खरीद  सकते हैं.

ऐसे में  मुझे फिल्म शराबी का गीत गुनगुनाने का मन कर रहा है,कि ‘’नशे में कौन नहीं है मुझे बताओ ज़रा…किसे है होश मेरे सामने तो लाओ जरा…नशा है सब पे मगर रंग नशे का है जुदा…’’इसका कारण है छत्तीसगढ़ में शराबबंदी को धता बताते हुए राज्य सरकार के इस धंधे में उतरने की घटना. हाँलाकि इसमें और भी कई उपघटनाएँ जुड़ी हुई हैं जो कि तस्दीक करती है कि हमाम में सभी दारूबाज हैं.

अब आप गौर कीजिए कि जिस भाजपा की सरकार इस राज्य में है उसी भाजपा की सरकार केन्द्र में भी है और हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार जाकर नीतीश कुमार की भरपूर प्रसंशा करते हुए कहा था कि ‘’ नीतीश ने जो नशामुक्ति का अभियान चलाया है, आने वाली पीढ़ियों को बचाने के लिए जो बीड़ा उठाया है इसके लिए मैं उनका ह्रदय से अभिनंदन करता हूँ.’’

जबकि छत्तीसगढ़ प्रदेश की सरकार अब बकायदा कॉर्पोरेशन बनाकर नशे का व्यापार करने वाली है. ऐसे में सवाल उठता है कि मोदी जी उस समय नशे में थे जब वे दुश्मनी भूलकर नीतीश की तारीफ कर रहे थे या वे अब नशे में हैं जब रमन सिंह की इस हरकत पर मौन साधे हुए हैं.dr-raman_singh_chief_minister_chhattisgarh_images

 

नशे में तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी हैं जिन्होंने 17 जून 2011 को सार्वजनिक घोषणा की थी कि- “हमारी सरकार ने राजस्व का नुकसान सहकर भी राज्य में शराब बंदी लागू करने की मानसिकता बना ली है. अब शराबबंदी में भी छत्तीसगढ़ पूरे देश के लिए एक आदर्श राज्य बनेगा. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के छत्तीसगढ़ मॉडल की तरह हम देश को नशाबंदी का छत्तीसगढ़ मॉडल भी देंगे.“  लेकिन अब जब आबकारी का राजस्व बढ़कर 3,347.54 करोड़ रूपए तक जा पहुंचा है तब सरकार अध्यादेश ले आई है कि अब शराब हम खुद बेचेंगे. अब बताइए मुख्यमंत्री जी किस नशे में  ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं?

अब बात करें जनता की, तो वो तो नंबर एक की शराबी है राष्ट्रीय वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण की मानें तो छत्तीसगढ़ के 100 में से 32 लोग शराब पीने के आदी हैं, जो देश में सर्वाधिक है.लगभग एक हज़ार दो सौ लाख प्रूफ लीटर शराब गटककर अपने में मस्त हैं.तो वहीं शराब पीकर मरने वालों का आंकड़ा या शराबजनित अपराध भी लगातार बढ़ रहे हैं. वहीं इससे पीड़ित जनता कई बार आंदोलन कर चुकी है.और अभी भी वे इस आस में बैठी है कि सरकार शराबबंदी लागू कर राज्य को बचा लेगी.

पुरी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने  आरोप लगाया था   कि छत्तीसगढ़ में लोग धार्मिक होने के बजाये शराबी हो रहे हैं.तो वहीं  हाल ही में बलौदा बजार स्थित दामाखेड़ा में कबीर पंथ प्रमुख प्रकाश मुनी ने रमन सिंह के सामने नशाबंदी की मांग रखी.तो रमन सिंह ने स्टेर बाई स्टेप इसे लागू करने की बात कही. हो सकता है नशे की वजह से सरकार धीर-धीरे रेंगती हो.

अब बात करें सोशल मीडिया की तो इसमें भी हो हल्ला तेज़ है शराबबंदी के मसले पर अजब-गजब की प्रतिक्रिया सामने आ रही है.darru-wale-baba-2

छत्तीसगढ़ क्रांति सेना ने फेसबुक पर एक पोस्टर शेयर करते हुए लिखा है कि   ‘’ आरएसएस, भाजपा, एबीवीपी, विश्व हिन्दू परिषद, धर्म रक्षा वाहिनी जैसे सभी संस्थानो मे धार्मिक शराब और बाबा रामदेव के पतंजलि मे आयुर्वेदिक चखना उपलब्ध.’’     तो वहीं कुछ लोगों ने ये भी शेयर किया है कि ‘’रमन सिंह अब ‘चाऊँर वाले बाबा’ से अब ‘दारू वाले बाबा’ हो गए हैं’’

हाँलाकि सरकार का कहना है कि ‘देसी और विदेशी शराब दुकानों से मिलने वाले राजस्व को सुरक्षित रखने और राज्य के लोगों की सेहत के ख़्याल से यह फैसला लिया गया है.’वहीं छत्तीसगढ़ में शराब के ख़िलाफ़ लगातार आंदोलन चलाने वाले शराबबंदी संयुक्त मोर्चा के निश्चय वाजपेयी कहते हैं, “एक तरफ संविधान कहता है कि जनकल्याणकारी सरकार को शराबबंदी की ओर बढ़ना है, जनता भी लगातार शराबबंदी के लिए आंदोलन कर रही है लेकिन कॉरपोरेशन बना कर सरकार के ख़ुद शराब बेचने का फ़ैसला संविधान और जनता दोनों की भावनाओं के उलट है.”

सामाजिक कार्यकर्ता ममता शर्मा कहती हैं कि ‘’ यह संविधान की धारा 47 का सीधे तौर पर उल्लंघन है जिसमें कहा गया है कि सरकार मादक पदार्थ को प्रोत्साहन नहीं देगी’’  लेकिन प्रोत्साहन से एक कदम आगे अब छत्तीसगढ़ सरकार खुद इसे सरकारी मार्का लगाकर बेचने जा रही हो तब तो यही कहा जा सकता है कि ‘’धीरे- धीरे ‘चाऊर वाले बाबा’  ‘दारू वाले बाबा’ बन रहे हैं.’’

हाँलाकि यह इतना आसान नहीं है कि कोई अपने चावल वाले बाबा जैसे सकारात्मक इमेज के उलट दारू वाले बाबा के तौर पर पहचाने जाएं.हाँलाकि एक बारगी तो यही लगता है कि इसकी वज़ह मोटा राजस्व है लेकिन राज्य में शराब से होने वाली मौतों और अपराध के बरक्स यह राजस्व जनता के लिए महत्वहीन है मगर इस पर चावल वाले बाबा का यह अध्यादेश किसी शराबी के फैसले से कम नहीं है.

 

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