‘मदर इंडिया’ और ‘नर्गिस’ के अक्स वाली ‘एक हसीना’

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फिल्मी दुनिया में  ‘मदर इंडिया’ और  ‘नर्गिस’  के अक्स वाली  ‘एक हसीना’  के बारे में बता रहे हैं  विशाल शुक्ला

अगर बरबस ही हम से कोई पूछ बैठे कि गुजरे जमाने की किस अदाकारा में ‘एक हसीना’ और मदर इंडिया ‘नर्गिस’ सरीखी संजीदा अभिनेत्री का अक्स एक साथ दिखाई देता है तो शायद ही सत्तर एमएम के पर्दे का कोई तलबगार ये कहने से चूके कि- शर्मिला टैगोर.

असल में इंकार करने की कोई वजह भी तो नही है, ‘एन इवनिंग इन पेरिस’ की ग्लैमरस अभिनेत्री से लेकर ‘अमर प्रेम’ की संजीदा ‘पुष्पा’ का सफर जिस खूबसूरती के साथ उन्होंने तय किया वो य़कीनन खुद में बेमिसाल है. कहना गलत ना होगा कि राजेश खन्ना की संवाद अदायगी के अतिरिक्त शर्मिला की अदाकारी ने भी अमर प्रेम के इस संवाद को अमर करने में खासी भूमिका निभाई…”आई हेट टिय़र्स पुष्पा”

शर्मिला टैगोर के फिल्मी सफर की कहानी भी किसी फिल्मी किस्सागोई से कम नही है. कहते हैं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के खानदान में जन्मी इस ‘बंगाली- कश्मीर की कली को पहला फिल्म एसाइनमेंट महज तेरह बरस की उम्र में ही मिल गया था, फिल्म थी- ‘अपूर संसार’ और निर्देशक थे कालजयी- सत्यजीत रे.sharmila-2

‘अपूर संसार’ की बाल बधू से शुरु हुआ शर्मिला का सफर ‘कश्मीर की कली’ की रुठती-इठलाती चम्पा से होते हुए ‘अनुपमा’ की ट्रेजडी क्वीन तक अनवरत जारी रहा.

‘अपूर संसार’ से शर्मिला का फिल्मी सफर शुरु तो हो गया था पर उन्हे पहचान दिलाई शक्ति सामंत की ‘कश्मीर की कली’ ने। इस फिल्म में अभिनेता थे अपने जबर्दस्त आई कांटेक्ट के लिए शम्मी कपूर.

इस फिल्म में जब हिन्दी सिनेमा के दर्शको ने उन्हे पहली बार देखा तो उनकी मासूम मुस्कुराहट, दिलकश अदाकारी और गालों पर पडते डिंपल के दीवाने हो गए. और इस तरह बालीवुड को मिल गई उसकी पहली और ओरिजिनल डिंपल गर्ल.

इतना ही नही ‘कश्मीर की कली’ के महज दो बरस बाद ही जन्म लेते ही अपनी माँ को गवाँ देने वाली और पिता द्वारा तिरस्कृत मासूम बच्ची की भूमिका में शर्मिला ने जान डाली दी, फिल्म थी- ‘अनुपमा’ और निर्देशक थे अजर अमर- ऋषिकेश मुखर्जी.

‘आराधना’ की रिलीज के साथ ही शर्मिला ने एक और चलन को तोड़ा. उस दौर में जहाँ अभिनेत्रियों की शादी का मतलब करियर का शटर डाउन होना माना जाता था वहीं उन्होंने शादी के बाद ही बेहद सफल ‘आराधना’ जैसी रोमांटिक फिल्म दी.

एक रोचक तथ्य यह भी है कि सैफ अली खान के जन्म से ठीक पहले जब वह छह माह की गर्भवती थीं, तभी उन्होंने आराधना के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार ग्रहण किया था.साथ ही साथ उन्होंने गुलजार की मौसम में प्रेमिका, पागल वृद्धा और नशे में चूर तवायफ के बहुआयामी किरदारों को एक ही फिल्म में निभाकर उन आलोचकों को भी शांत करा दिया जो उन्हें सिर्फ रोमांटिक किरदारों का पर्याय मानते थे.

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उन दिनों शर्मिला टैगोर की लोकप्रियता का आलम यह था कि व्यस्तता के कारण उनके लिए सुपरहिट आराधना के चर्चित गीत ‘मेरे सपनों की रानी’ के लिए राजेश खन्ना के साथ शूटिंग करना संभव नही था, शर्मिला मुंबई में किसी अन्य फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थीं, और गाने को दार्जिलिंग में फिल्माया जाना था.

अतः निर्देशक शक्ति सामंत ने गाने में राजेश खन्ना वाले हिस्से को दार्जिलिंग में फिल्माया और शर्मिला टैगोर वाले हिस्से (जिसमें वह ट्रेन में बैठी एक किताब पढ रहीं हैं, यह किताब भी अपने समय का चर्चित थ्रिलर उपन्यास- एलिस्टर वावेल द्वारा लिखित और वर्ष 1966 में प्रकाशित ‘When Eight Bells toll’ था) को मुंबई में फिल्माया गया और बाद में संपादन के जरिए दोनों हिस्सों को जोड़ा गया.

इसके अतिरिक्त आराधना के साथ एक और ऐतिहासिक तथ्य जुड़ा है. आराधना लगातार सौ से अधिक दिनों तक सिनेमाघरों में चलने वाली भारतीय सिनेमाई इतिहास की पहली फिल्म थी. यह कारनामा इसलिए और उल्लेखनीय है कि दिन में चार शो और गैर हिन्दी भाषी पूर्वोत्तर और चार दशिण भारतीय राज्यों में इस फिल्म ने लगातार तीन वर्ष तक चलने वाली पहली फिल्म बनकर इतिहास रचा था. इसके साथ ही इस फिल्म ने पूरे भारत वर्ष में प्लेटिनम जुबली मनाने का गौरव भी हासिल किया, इस फिल्म ने यह कीर्तिमान उस दौर में रचे जब सिल्वर जुबली को ही किसी फिल्म के सफल होने का प्रतीक मान लिया जाता था.

कहना गलत ना होगा कि शर्मिला टैगोर ने आराधना, अमर प्रेम और सत्यकाम जैसी न सिर्फ बेहद सफल फिल्में दीं बल्कि हिन्दी सिनेमाई इतिहास के सर्वकालिक खूबसूरत गीत भी उन्ही के हिस्से आए हैं मसलन- अमर प्रेम का ‘रैना बीती जाए’, अनुपमा का ‘कुछ दिल ने कहा’ और दिल और मुहब्बत का ‘हाथ आया है जबसे तेरा हाथ में, आ गया है रंग नया जज्बात में’.

 

 

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