क्यों गाँव में बसने वाले दलित को गरीबी से निकलने में तीस साल लग जाते हैं?

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साम्राज्यवाद के विरोध से लेकर एक आधुनिक भारत के निर्माण की यात्रा में भी दलित की शिकायत पूरी तरह से  दूर क्यों नही हुई और यदि एेसा हुआ भी है,तो आज भी बिहार के गाँव में बसने वाले दलित को गरीबी से निकलने में लगभग तीस वर्ष लग जाते हैं,जबकि किसी गैर दलित के लिए यह अवधि दो साल आँकी गयी है.

सच्चाई तो यह है ,कि गरीबी के नीचे रहने वाली कुल 48 प्रतिशत आबादी के सापेक्ष दलित आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा इस अतिदरिद्रता की हालत में रहता है.देश की आबादी का 16 प्रतिशत हिस्सा होने के बाद भी दलितों के पास कुल खेती योग्य जमीन का केवल एक हिस्सा ही है.साक्षरता दर भी अन्य समुदायों के मुकाबले कम ही है.कानूनी आधार पर पाबंदी होने के बाद भी देश के अनेक हिस्सों में अस्पृश्यता का माहौल है.नयी सदी में जाने से पहले सरकारी आँकड़ों  के अनुसार -उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,आंध्र प्रदेश,बिहार,गुजरात,कर्नाटक,महाराष्टृ,ओडीशा,राजस्थान तमिलनाडु,पाँडिचेरी और देश के सबसे साक्षर राज्य केरल में भी असपृश्यता का माहौल है.सरकारी आँकड़े कहते हैं कि इन राज्यों के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश,जम्मू और कश्मीर,पंजाब,दिल्ली,गोआ आदि राज्यों में इस कुप्रथा पर असर हल्का हुआ है.women_in_tribal_village_umaria_district_india

अत्याचार की हालत यह है कि देश में हर एक घंटे में 2 दलितों को हिंसक हमलों का शिकार होना पड़ता है,प्रत्येक दिन 3 दलित औरतों के साथ बलात्कार होता है,प्रत्येक दिन दो दलितों की हत्या कर दी जाती है और दो दलितों के घरों में आग लगा दी जाती है. दलित अस्मिता का सवाल स्वंय में सामाजिक असंतुलन का नही है,बल्कि आधुनिकता की रोशनी में सराबोर हेने के बाद भी दलितों के  हालात में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है.शायद दलित वर्ग के इस हालात का जिम्मेदार ,उनका ‘सत्ता’ नहीं वरन ‘राजनीति’ में उचित प्रतिनिधित्व न होना है.हमारा दुर्भाग्य है कि देश की सत्ता में भी सर्वोच्च पदों पर एेसे लोगों की भागीदारी है,जो स्वंय ही दलित होने के अपराधबोध से ग्रस्त हैं,और बार बार सार्वजनिक तौर पर  अपने पार्टी हाईकमान का धन्यवाद यह कहते हुए करते हैं कि मुझ दलित को अमुक पद से सम्मानित किया गया है.साथ ही दलितों के इन हालातों की जिम्मेदार हमारी राजनीतिक प्रणाली भी है, जो बहु केंद्रीय,बहु जातीयऔर जातिगत बहुलता वाले यथार्थ के लिए बनाई गई थी, उसका संचालन सही न हो  पाना भी एक समस्या रही . इस कारण राज्य एक बार फिर दमनकारी हो गया है,जिसका सवाधिक नुकसान उत्पीड़ित तबके को हुआ है. इसके अतिरिक्त दलित सम्बन्धी लेखन, चिंतन औरआंदोलनों में महिलाओं की न के बराबर भागीदारी भी रही. इस असमानता की प्रमुख वजह ,महिलाओं पर पितृसत्ता का दोहरा दबाव रहा है.जहाँ एक और उन्हें अपने ही समाज की की पितृसत्ता को झेलना पड़ता था तो वहीं सवर्ण समाज  की पितृसत्ता भी उनका शोषण करती रही.केरल के त्रावणकोर के पूर्वी जिलों में महिलाओं को उपरी वस्त्र पहनने की आजादी नहीं थी,साथ ही फूल और केसर का लेप न लगाने  जैसे तालिबानी आदेश प्रचलन में थे,एेसा  न करने पर उनकी छातियाँ तक काट डाली जाती थी.साथ ही राजस्थान में भी दलित महिलाएँ दासियों और रखैलों की स्थिति में थी,हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों में दलित महिलाओं को विवाह की पहली रात को किसी नबाब,जमींदार के साथ गुजारने पर विवश होना पड़ता था.इसके अतिरिक्त इन सबके लिए हमारे मीडिया का एक बड़ा वर्ग जिम्मेदार है.देश में प्रिंट मीडिया के विकास के बाद और विशेषकर पिछले डेढ़ दशक में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास के बाद भी दलित-मुद्दों के साथ दोहरा रवैया अपनाया गया.उदाहरण के लिए मेधा पाटेकर के पर्यावरण आंदोलन को जो स्थान मीडिया ने दिया,वह स्थान आंध्र प्रदेश की दलित महिलाओं द्वारा चलाये गये शराब विरोधी आंदोलन को नही दिया गया.जातिगत चेतना के नये विस्फोट से यद्दपि इस बारे मे चला आ रहा ब्राह्मणवादियों का एकाधिकार खत्म हुआ है , फिर भी जिन लोगों से जातिगत विभाजनों को दूर करने की सर्वाधिक उम्मीद थी, उन्होंने ही इसका सर्वाधिक दोहन किया है. यदि इस तथ्य पर गौर किया जाये, तो पता चलता है कि एक समय तक दलित का मतलब ही था कांग्रेस का वोट बैंक, साठ के दशक मे रिपब्लिकन पार्टी ने कांग्रेसी सत्ता को चुनौती देने की असफल कोशिश की , क्योकि उत्तर प्रदेश ओर महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों मे अपना प्रभाव रखने वाली यह पार्टी दशक खत्म होते-होते समाप्त हो गयी। 1967 और 1977 मे भी कांग्रेस को मिले दलित वोटों का प्रतिशत क्रमश:45.2 और 35.7रहा.

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दलितो की पसंद में आये बदलाव का संकेत अस्सी और नब्बे के चुनाव परिणामों से मिलना शुरू होता है. 1966 तक दलित यू.पी.और बिहार जैसे महत्वपूर्ण र समेत कई राज्यों मे कांग्रेस को खारिज कर चुके थे ,शायद यही कारण था कि कांग्रेस की हालत दूसरे दर्जे की हो गई.1998 आते-आते कुछ राज्यों को छोड़कर दलितों ने कांग्रेस को लगभग पूरी तरह खारिज कर दिया. वर्तमान परिदृश्य में बसपा उनकी पहली पसंद बनती है और उसका विकल्प न होने पर वे क्षेत्रीय पार्टियों को वोट देना चाहते है. 1996 के चुनावों मे कुल वोट प्रतिशत का 67%दलित वोट प्राप्त कर शुरू हुआ बसपा का स्वप्निल सफर 2007 के उ.प्र. विधानसभा चुनावों में सीटे प्राप्त करने तक जारी रहा.लेकिन बसपा ने दलित हित में कुछ रचनात्मक करने के बजाय,द्विज जातियोंऔर  दलितों के मध्य सामाजिक भेद को एकतरफा कार्यवाही कर वढ़ावा दिया.यह पार्टी भी दलित हित में कुछ रचनात्मक करने के बजाय समाज को सोच को स्तर पर और पीछे लेकर गयी,और अन्य पार्टियों की तरह ‘जाति दुहो और राज करो’ के् फार्मूले पर आगे बढ़ी.
लेकिन आ्रज समय के साथ-साथ दलितों का बदलता रुझान बताता है कि वह राजनीतिक दलों और उनके नेताओं से निराश हैं, क्योंकि यदि इन लोगों ने दलित हितों के प्रति अपने वास्तविक दायित्वों को पूरा नहीं किया,तो यह तबका संसदीय के बजाय गैर संसदीय संघर्षों में अपने हितों को तलाशने लगेगा.उस स्थिति की कल्पना मात्र से लगता है कि वह अराजक ही होगी,क्योंकि कोई वर्ग विशेष जब अपने हितों की रक्षा के लिए गैर संसदीय रास्तों का रुख करतै है, तो किसी भी राष्टृ के लिए वह स्थिति सुखद नही होती.

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