भारत के राष्ट्रीय पशु के लिए क्यों ख़तरनाक है चीन?

कभी-कभी यह लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब हम  ये कहते हुए दिखेंगे कि ‘एक था टाइगर’ क्योंकि लाख प्रयासों के बावजूद हम बाघों के शिकार पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं.वहीं चीनी बाज़ार मुख्य रूप से इन बाघों की मौतों की वजह बन रहा है.

साल 2016  भारत में बाघों की ज़िदगी के लिए बहुत खतरनाक रहा है.इस साल देश भर में 120 बाघों की मौते हुईं जिसमें सबसे अधिक मध्यप्रदेश में बाघ मारे गए. आँकड़ो के हिसाब से पिछले दस सालों में यह पहली बार है जब इस तादात में बाघों की मौतें हुई हैं.

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बता दें कि सबसे अधिक बाघ भारत में ही पाए जाते हैं.विश्व में इस समय बाघों की कुल जनसंख्या 3,890 है जिसमें 2,226 बाघ भारत में हैं. हाँलाकि इस समय हमारे देश में बाघों की संख्या बढ़ी है लेकिन साथ ही बाघों का शिकार भी बढ़ा हुआ है. एक वेबसाइट के मुताबिक गुज़रे सालों में बाघ की 22 खालें बरामद हुई.बाघों को ज़हर देकर मारने सहित गाड़ी के टक्कर से भी बाघों की मौतें हुईं.

जानकारों के मुताबिक एक बाघ ज़्यादा से ज़्यादा 26 साल तक की आयु तक जी सकता है.लेकिन उन पर बढ़ रहे हमले उनको अपनी औसत आयु भी पूरी करने नहीं दे रहे हैं.राज्यवार बाघों की मौतों पर नज़र डालें तो मध्यप्रदेश में  में 32 बाघ मारे गए. वहीं कर्नाटक में 17 और महाराष्ट्र में 16 बाघों की मृत्यु हुई.

आखिर क्यों मारे जा रहे हैं बाघ?

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भारतीय इतिहासकार महेश रंगराजन के मुताबिक 1875 से 1925 के बीच राजाओं, लॉर्ड्स, जनरलों और महाराजों ने 80,000 बाघ मारे. 1947 के बाद हजारों बाघ जंगल उजड़ने से मारे गए. घटते जंगलों के कारण बाघों और इंसानों में टकराव बढ़ा और इसकी कीमत भी बाघों ने ही ज्यादा चुकाई. साथ ही सबसे बड़ी वजह मानी जाती है चीनी दवाओं के कारोबार को. चीन की पारंपरिक दवाओं में बाघ के करीब हर अंग का इस्तेमाल होता है.

बाघों को संरक्षित करने का प्रयास

राष्ट्रीय पशु बाघ को बचाने के लिए 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरू हुआ. इसके अंतर्गत देश भर में 50 टाइगर रिजर्व बनाए गए.उसी का परिणाम रहा कि 2014 में बाघों की तादात में 30 प्रतिशत की वृध्दि हुई. लेकिन हाल में यह आया आँकड़ा काफी निराशाजनक है.

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