बस्तर के ‘ढोलकल’ से वायरल हो रही है एक अपील,जानिए क्यों?

इन दिनों छत्तीसगढ़ का बस्तर एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है,चर्चा की वज़ह नक्सली-पुलिस मुठभेड़ नहीं है बल्कि एक घटना है जिसको लेकर लोग ये आरोप लगा रहे है कि ‘बस्तर के इतिहास की योजना बध्द हत्या की जा रही है’ दरअसल बस्तर के पास दंतेवाड़ा से 24 किमी दूर बैलाडीला के ढोलकल पहाड़ी पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित थी जिसे किसी अज्ञात ने खंडित कर पहाड़ी के चोटी से नीचे फेंक दिया. ग्रेनाइट से बनी 6 फीट की इस मूर्ति का ऐतिहासिक महत्व रहा है जिसके खंडित होने से लोगों में आक्रोश है. इस घटना से आक्रोशित लोग सोशल मीडिया में एक अपील को शेयर कर रहे हैं जिसमें आम-लोगों के गुस्से को अनुभव किया जा सकता है.

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इस अपील में लिखा है कि ‘ढोलकल – बस्तर के इतिहास की योजनाबद्ध हत्या, एक विनम्र अपील’

विशेषज्ञों के अनुसार यह जानकारी सामने आ गयी है कि पहले ढोलकल पर अवस्थित प्रतिमा को हथौड़े अथवा किसी भारी वस्तु से प्रहार कर तोड़ने की कोशिश की गयी. जब इसमें सफलता हाथ नहीं लगी तब सब्बल आदि से इसे धकेल कर पहाड़ी से नीचे गिरा दिया गया.इस घटना को अंजाम देने के पश्चात कई कहानियाँ ध्यान भटकाने के लिये लाल-आतंकवाद समर्थकों द्वारा भी प्रसारित की गयीं मसलन हैलीकॉप्टर थ्योरी. अब तो कतिपय जहरीली कहानियाँ भी तुष्टीकरण के लिये फैलने लगी हैं. ऐसा जहर इन हवाओं में है जो जान बूझ कर इतिहास को चकनाचूर करने को आमदा है.वह साक्ष्यों को तोडता है और गल्पों को गढता है. यथार्थ यह है कि बारह सौ वर्षों से जो प्रतिमा दक्षिण बस्तर के गौरवशाली अतीत का शीर्ष बन कर खड़ी थी उसे जान-बूझ कर तोड़ा गया है. अगर किसी को साजिश की बू नहीं आ रही तो रतौंधी का इलाज अवश्य करा सकता है. कोई शरारती तत्व हथौडे और सब्बल ले कर प्रतिमा ध्वंस के लिये नहीं चढ सकता. अब कोई दूसरा संदेह नही, यह अपने अस्तित्व को इस क्षेत्र में संरक्षित करने के प्रयास के लिये नक्सल घटना ही है. यह इतिहास की योजनाबद्ध हत्या है.

अपील: – यह कोई आंचलिक घटना नहीं है जिसके लिये इतनी खामोशी और संवेदनहीनता हो. आज अगर इस विद्द्वंस की इस घटना पर आप नहीं बोले तो धीरे धीरे वह सब भी ध्वस्त हो जायेग जो बस्तर की अतीत को समझने का ही कारक नहीं इस देश के इतिहास के पन्नों में लिखावट है.

मेरी अपील दिल्ली से है कि हमारे विरोध का स्वर बनें. यह घटना किसी भंसाली को पड़े थप्पडों से अधिक बड़ी है और इसके निहितार्थ बहुत गंभीर हैं. हमारी आवाज बनिये. हमें हमारा ढोलकल लौटाने में कृपया देश के हर कोने से उठती हुई आवाज बनें. विनम्र अपील है देश के इतिहासकारों, लेखक-साहित्यकारों और कलाकारों से……’’

गणेश प्रतिमा का ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व

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विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार की मूर्ति पुरे बस्तर में अकेली है,अनुमान लगाया जा सकता है कि इसको बस्तर के छिंदक नागवंशी राजाओं के समय में लगभग 10वीं-11वीं शताब्दी में स्थापित करवाया गया हो. इसके अलावा जनश्रुतियों और पौराणिक कथाओं के मुताबिक इस क्षेत्र में  भगवान परशुराम और श्रीगणेश के बीच द्वन्द युद्ध  हुआ था. युद्ध में भगवान गणेश के एक दाँत को परशुराम जी ने अपने फरसे से काट दिया था, जिसके बाद श्रीगणेश एकदंत कहलाए.इसी वजह से माना जाता है कि  पहाड़ी के नीचे स्थित ‘फरसपाल’ गाँव का नामकरण भी इस घटना के वजह से हुआ.

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हाँलाकि ड्रोन की सहायता से मूर्ति के काफी हिस्सों को ढूँढ लिया गया है जिसे जल्द ही जोड़ने का काम शूरू किया जाएगा. पद्मश्री अरुण कुमार शर्मा ने प्रतिमा जोड़ने को लेकर कहा कि ‘’प्रतिमा का 80 से 85 फीसदी हिस्सा मिलना खुशी की बात है. प्रतिमा को फरसपाल में जोड़ने की बजाय पुरानी जगह पर ले जाकर ही री-सेटिंग की जायेगी.’’

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घटना से जुड़ी वायरल हो ही अपील को लिखने वाले साहित्यकार राजीव रंजन प्रसाद अपनी निराशा जाहिर करते हुए ये भी लिखते हैं कि  ‘’ढोलकल प्रतिमा के विद्ध्वंस ने भावुक कर दिया है. आँखें रह रह कर नम हो जाती हैं. नाग शासकों की विरासत पर अपना उपन्यास “ढोलकल” लिखते हुए इस प्रतिमा के बनाये जाने की पूरी संकल्पना मैने कथानक में बुनी थी. आज ढोलकल का भव्य एवं पुरातत्व की दृष्टि से छत्तीसगढ राज्य का सुंदरतम स्मारक नष्ट कर दिया गया है. अधिकांश जानकारों, कतिपय पत्रकारों और पुलिस सूत्रों का मानना है कि यह कृत्य नक्सलवादियों द्वारा पर्यटकों की इस क्षेत्र में बढती हुई तादाद को देखते हुए किया गया है.. शर्मसार हूँ कि इस धरोहर को बचाने का नागरिक कर्तव्य निर्वहन कर पाने में हमारी विफलता है. आक्रोशित हूँ कि कातिल विचारधारायें अब हमारी धरोहरों के अस्तित्व की प्यासी हो उठी हैं.’’

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