कौन खा रहा है झारखण्ड के लाखों आदिवासी-दलित विद्यार्थियों का हक़?

झारखण्ड के लाखों आदिवासी और दलित विद्यार्थियों को शासन द्वारा प्रदत्त छात्रवृत्ति का लाभ नहीं मिल पा रहा है जिससे उनकी शिक्षा में बाधा पैदा हो रही है नतीज़तन उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ रही है ये कहना है राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान के सुनील मिंज और स्वाधिकार झारखंड के मिथिलेश कुमार का इन्होंने संयुक्त रूप से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि ‘पिछले दो वर्षों से पोस्ट मैट्रिक छात्रवृति के आवेदन एवं भुगतान में गंभीर अनियमितताएं हो रही है जिसका सीधा प्रभाव लाखों गरीब दलित एवं आदिवासी विद्यार्थियों के उच्च शिक्षा पर पड़ रहा है.’’

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सूचना काअधिकार के तहत  मिली जानकारी का हवाला देते हुए विज्ञप्ति में लिखा गया है कि ‘’अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों के लिए राज्य सरकार ने 48 करोड़ की मांग केंद्र सरकार से रखी थी, जिसमें से मात्र 9 करोड़ रुपये ही राज्य सरकार को प्राप्त हुए हैं, जबकि 39 करोड़ की राशि अभी तक बकाया है, जो छात्र-छात्राओं को अप्राप्त है छात्रवृति में विलंब के कारण हजारों दलित विद्यार्थियों को अपनी उच्च शिक्षा से वंचित होना पड़ा है. इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में 83 हजार अनुसूचित जनजाति के छात्र-छात्राओं को पोस्ट मैट्रिक छात्रवृति प्रदान करने हेतू 90 करोड़ की आवश्कता थी, पर केंद्रीय अनुसूचित जनजाति मंत्रालय द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार झारखंड सरकार की ओर से विलंब से राशि का मांग पत्र रखी गयी, जिसके वजह से लाखों आदिवासी छात्र-छात्राओं को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.’’

विज्ञप्ति में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि ‘’झारखंड राज्य सरकार को केंद्र सरकार से पोस्ट मैट्रिक छात्रवृति हेतू वर्ष 2016-17 में 180 करोड़ का प्रस्ताव भेजा जाना था. पर वर्तमान स्थिति में पिछले दो वर्ष का बकाया छात्रवृति राशि का भुगतान हजारों छात्र-छात्राओं को नहीं हुआ है.’’

बता दें कि  पोस्ट मैट्रिक छात्रवृति की योजना दलित और आदिवासी छात्र-छात्राओं के उच्च शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण योजना है जिसकी शुरूआत डॉ. भीमराव आंबेडकर के प्रयासों से सन 1944 में किया गया था. इस योजना के तहत इंटर से स्नातकोत्तर तक सभी आदिवासी एवं दलित विद्यार्थी को जिनके परिवार की वार्षिक आय 5 लाख रुपये से कम है उनको उपलब्ध कराई जानी है. लिहाज़ा वर्ष 2015-16 में 33 हजार 733 दलित एवं 90 हजार से अधिक आदिवासी विद्यार्थियों ने झारखंड राज्य में इस छात्रवृति के लिए आवेदन किया था. इस छात्रवृति के तहत कॉलेज की फीस, निर्वहन भत्ता, छात्रावास षुल्क आदि हेतू खर्चे दिये जाने का प्रावधान है. पूर्व में छात्रवृति का भुगतान कल्याण विभाग द्वारा कॉलेज को किया जाता था, पर डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांस्फर योजना के तहत वर्ष 2014-2015 से छात्रवृति आवेदन की पूरी प्रक्रिया ई-कल्याण वेवसाइट पर ऑनलाइन की जाती है और भुगतान विद्यार्थियों के बैंक खाते में किया जाता है.

विज्ञप्ति में यह भी आरोप लगाया गया है कि  ‘’छात्रवृति आवेदन प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं इस प्रकार हो रही हैं कि राज्य के कई जिलों में छात्र-छात्राओं को आय-जाति, आवास और बोनाफाइट प्रमाण पत्र बनाने हेतू अधिकारियों व कॉलेज प्रबंधन द्वारा जान बुझकर विलंब किया जा रहा है, जिसके कारण निर्धारित समय सीमा 22 दिसंबर तक भी हजारों छात्र-छात्राएं आवेदन प्रपत्र नहीं भर पायें हैं.’’

झारखण्ड राज्य का गठन आदिवासियों के विकास के नाम पर किया गया था ऐसे में यह वाकया आदिवासियों को शिक्षा प्रदान कर मुख्य-धारा में जोड़ने की बात के बिल्कुल उलट दिखाई देता है जहाँ शिक्षा के लिए दिए जा रहे प्रोत्साहन को चोट पहुँचाई जा रही है. विज्ञप्ति में लगाए गए आरोप कहाँ तक सही है यह तो जाँच के बाद पता चलेगा लेकिन इस आरोप के निवारण के लिए सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए.

 

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