गाँव की हवा ने बुलाया, बंदा यूएस छोड़ ओड़िशा आया

भले ही हम हिंदुस्तानी यह कहते हैं कि ‘गांव में तो हमारा प्राण बसता है’ तो फिर भईया दिल्ली-मुंबई में काहे जा बसे हो? बहुत कमा लिए पर गांव तो नहीं आए, हां,अब तो दिपावली-होली में भी कहीं ओर चले जाते हो, पर एक आईआईटीयन, इंजीनियर, प्रोफेसर, जिसको गांव के लोग कहते हैं ना बहुत पढ़ा-लिखा, माने की बहुते पढ़ा, खूबे. वह तो गांव में गोबर उठा रहा है,दूध बेच रहा है.

यह बात बनावटी नहीं बिलकुल इस आईआईटीयन की तरह ही एकदम खरी है. सुनने में भले ही अटपटा लगे पर जानकर आपके अंदर भी गांव का प्रेमरस पोर-पोर में भर आएगा. इतना ही नहीं यह शख्श एमपी, एमएलए नहीं बल्कि ओड़िशा त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में पंचायत समिति सदस्य के लिए उम्मीदवार है.हम बात कर रहे हैं प्रोफेसर(इजी.) निहार रंजन की.iitian2

आईआईटी खड़गपुर से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट में एम.टेक करने और जर्मनी, फ्रांस, यूके और यूएस जैसे कई देशों में लगभग आठ-नौ साल नौकरी करने के बाद प्रोफेसर (इजी.)निहाररंजन बेउरा को गांव की सेवा करने का मन हुआ. 2008 में विदेश के सुख को त्याग कर अपने गांव केंद्रापड़ा जिले के मरसाघई ब्लॉक अंतर्गत दुमुका गांव पहुंचे. बस दिल में गांव की सेवा को बसाए. लोगों को तो लगता है कि ज्यादा पढ़-लिख लिया है तो कोई चंपत लगाएगा तो किसी ने पागल तक समझा. पर निहाररंजन बेउरा ने बस मन की सुनी और खुद को साबित करने के लिए शुरुआत शुध्द-सस्ता दूध डेयरी काम से की, जिसमें गांव के गरीब लोगों को बिना मुनाफा कमाए शुध्द व सस्ता दूध उपलब्ध कराते हैं. गांव के सात परिवार उनके साथ डेयरी से जुड़े हुए हैं.

आठ साल लगातार अलग-अलग देशों में मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ काम करने के बाद वे लौट आए थे, लेकिन फिर दो साल के लिए चले गए. इसके बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह गांव की सेवा के लिए समर्पित कर दिया. अब वे गांव के लोगों के लिए नई मिसाल बनकर उभरे हैं.

निहार रंजन की दर्द भरी कहानी

50 साल के निहाररंजन के संघर्ष की कहानी बिल्कुल फिल्मी लगती है. पर यह काल्पनिक फिल्म नहीं उनके जीवन का रियल सिन है. जिसने निहार को कुरेदकर इंजिनीयर बना दिया. जब वे एक साल के थे तब साइक्लोन ने उनके पिता और बड़े भाई को शिकार बना लिया. यह 1967 की घटना है. उस समय उनकी मां की उम्र महज 25 साल थी. मां ने जी-तोड़ मेहनत कर उन्हें पढ़ाया. तब जाकर निहार रंजन में निखार आया, जिसके कायल हैं हम.iitian

गरीबी ने दिया जज़्बा

लोग गरीबी दूर करने के लिए देश-विदेश कमाने निकल जाते हैं और घुमकर देखते तक नहीं और निहार भी देश-विदेश में कमाने गए. निहार बताते हैं कि काम तो विदेश में करता था पर मन गांव को ढूंढता रहता, चिंता सताती गांव वालों की और एक दिन गांव की यादों ने इस कदर झकझोरा की लौट कर आना पड़ा. अपने गांव लौटने के बाद निहार कीट यूनिवर्सिटी, भुवनेश्वर से जुड़े रहे. अभी वे सलाहकार के रूप में जुड़े हैं. उनकी पत्नी और दो बच्चे भुवनेश्वर में रहते हैं. निहार के मुताबिक गांव की गरीबी और संघर्ष ने उन्हें सेवा करने का जज्बा दिया, इसलिए वे यहां वापस लौट कर गांव की सेवा में लगे हुए हैं.

बहरहाल हमारी टीम तो यही कामना करती है कि वह आने वाले कल में पंचायत ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर समाज की सेवा करे.

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