अदम गोंडवी की पाँच ग़ज़लें हर इंसान के लिए जो इंसान बनना चाहते हैं..

हम कबीर के समय में पैदा नहीं हो सके,दुष्यंत कुमार को भी नहीं देख पाए लेकिन हमारी सदी में एक ऐसा कवि हुआ जिन्होंने हमारी इन इच्छाओं को सलीके से पाट दिया. जब कबीर की तरह फकीराना अंदाज़ और दुष्यंत की तरह गज़ल को नए कलेवर में ढालने की शक्ति का एकाकार होता है तब कोई रामनाथ सिंह अदम गोंडवी बनता है. 22 अक्तूबर 1947 को उत्तर प्रदेश के आटा ग्राम (परसपुर, गोंडा) में जन्मे अदम गोंडवी ज़िदगी भर अपनी कृतियों के नाम के अनुसार  ‘धरती की सतह’ पर, ‘समय से मुठभेड़’ करते रहे.18 दिसम्बर 2011 वे हमें अलविदा कह गए लेकिन अपनी कृतियों से वे आज भी इस दुनिया में  मौजूद हैं. उनकी कुछ प्रतिनिधि गज़लें हर उस इंसान के लिए है जो इंसान बनना चाहते हैं-

adam-gondvi

 1.

भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो

या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जल्वों से वाक़िफ़ हो गयी

उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको नज़्मो-ज़ब्त की तालीम देना बाद में

पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो

गंगाजल अब बूर्जुआ तहज़ीब की पहचान है

तिशनगी को वोदका के आचमन तक ले चलो

ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धिखे में लोग

इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो.

2.

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये

अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है

दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले

ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ

मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़

दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

3.

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है

बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है

भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी

सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में

मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे

मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है

4.

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में

उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत

इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह

जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें

संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत

यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

5.

 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की

यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत

वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की ,संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी

ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया

सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार

होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की.

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