आप ‘जलीकट्टू’ तो जान ही गए अब ‘पोरा’ भी जान लीजिए…

प्रदर्शन,हिंसा,लाठीचार्ज,आत्महत्या की धमकी,अध्यादेश,विधेयक… एक मनोरंजक त्यौहार के लिए लोग कहाँ तक जा सकते हैं अगर इसकी साफ तस्वीर देखनी है तो जलीकट्टू के माध्यम से इसे बेहतर तरीके से देखी जा सकती है.लेकिन ‘पोरा’ पर्व का नाम आपने शायद ही सुना होगा..

शायद इसलिए कि ये बैलों के प्रति कृतज्ञता का त्यौहार है. दरअसल मानवीय प्रवृत्ति शक्ति प्रदर्शन को नानुकूर करते हुए भी नमन करती  है वहीं कृतज्ञता या प्रेम जैसे शब्दों के लिए अपने मन में  एक सीमित तरीके का भाव रखती है. यहाँ दो त्यौहारों या दो संस्कृतियों की तुलना करना या किसी एक को अच्छा या बुरा कहना मेरा मक्सद नहीं है बल्कि मेरा लक्ष्य उस उस ओर ध्यान आकृष्ट कराना है जब छत्तीसगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता अपनी संस्कृति और त्यौहारों को बचाने के लिए जूझ रहे हैं मगर किसी को इससे रत्ती भर भी मतलब नहीं है जबकि ‘जलीकट्टू’ पर सब अपना उल्लू सही कर रहे हैं.

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‘जलीकट्टू’ को लेकर अब इतनी बहस बात हो गई है कि अधिकतर लोग इस त्यौहार को जानने लगे हैं फिर भी जो लोग इससे छूट गए हैं उनको हम बता दें कि  फसल कटाई के दौरान तमिलनाडु में चार दिन का पोंगल पर्व मनाया जाता है जिसका तीसरा दिन मवेशियों को समर्पित होता है. तमिल में ‘जली’ का मतलब है ‘सिक्के की थैली’ और ‘कट्टू’ का अर्थ है ‘बैल का सिंग’.अब इसके नाम से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिंग जो कि किसी भी जानवर की शक्ति का प्रतीक माना जाता है तब जरूर उसके साथ कुछ किया जाता होगा.  इस खेल में परंपरा के हिसाब से  शुरुआत में तीन बैलों को छोड़ा जाता है जिन्हें कोई नहीं पकड़ता. दरअसल ये गांव के सबसे बूढ़े बैल होते हैं. इन बैलों के जाने के बाद ‘जलीकट्टू’ का खेल आरंभ होता है.

बैलों के सिंगों पर सिक्कों की थैली बांधकर उसे भड़काया जाता है फिर  भीड़ में छोड़ दिया जाता है, जहाँ लोग उन्हें पकड़कर सिक्कों की थैली हासिल करने के लिए अपनी ताकत आजमाते हैं. इस खेल में बैलों पर जो काबू कर पाने में सफल होता है उसे इनाम दिया जाता है. इस खेल के लिए बैल को खूंटे से बांधकर उसे उकसाने की प्रैक्टिस करवाई जाती है.इस खेल को 2500 साल पुरानी बताई जाती है.

‘जलीकट्टु’ खेल के लिए मंदिरों के बैलों को विशेष रूप से तैयार किया जाता है. इसके पीछे वजह बताई जाती है कि, मंदिरों के ये बैल सभी मवेशियों के मुखिया माने जाते हैं. खेल के दौरान इन बैलों को एक-एक कर के भीड़ में छोड़ दिया जाता है. जिसके बाद उन्हें पकड़ने के लिए और उन पर सवार होने की कोशिश की जाती है

इस खेल में जिन बैलों को आसानी से पकड़ लिया जाता है उन्हें कमजोर माना जाता है. वहीं, जो बैल इस खेल में पकड़ में नहीं आते उन्हें मजबूत माना जाता है और उन्हें गायों के बेहतर नश्ल को बढ़ाने के लिए काम में लाए जाते हैं.

अब ये मामला इसलिए गरम है क्योंकि पशु प्रेमी इसके विरूद्ध आवाज उठाने लगे हैं और मामला न्यायालय तक पहुंच चुका है. उनका मानना है कि जल्‍लीकट्टू खेल के दौरान बैलों के साथ क्रूरता की जाती. इस खेल में रोमांच लाने के लिए बैलों को भड़काया जाता है इसके लिए उन्हें शराब पिलाने, नुकीली चीजों से दागने, उनपर सट्टा लगाने से लेकर उनकी आंखों में मिर्च डाला जाता है और उनकी पूंछों को मरोड़ा तक जाता है, ताकि वे तेज दौड़ सकें.

लिहाजा पशु कल्याण संगठनों के प्रयास के बाद साल 2014 में उच्चतम न्यायालय ने जानवरों के साथ हिंसक बर्ताव को देखते हुए इस खेल को बैन कर दिया था. जिसके बाद से लोग इसके लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. और ये भी कहा जा रहा है कि बैलों को भड़काने के लिए जो तरीके अपनाए जा रहे है  वो परंपरा का हिस्सा नहीं है लेकिन इसके लिए पूरे त्यौहार पर  रोक लगा देना भी उचित नहीं है.प्रदर्शन का आलम ये रहा कि तमिलनाडू सरकार को इस पर विधेयक लाना पड़ रहा है.

लोग इसे अपने-अपने एजेंडे के  हिसाब से विश्लेषण करने में लगे हुए हैं. कुछ लोग गौहत्या पर मौन रहने वालों को पशु क्रूरता पर बोलते देख तंज कस रहे हैं,तो कुछ इसके साथ बकरी ईद या बलिप्रथा पर भी चर्चा कर रहे है. लेकिन तमिलनाडू वालों को हर हाल में ‘जलीकट्टू’ चाहिए क्योंकि ये उनकी परंपरा का हिस्सा है और इसे पशु क्रूरता का नाम नहीं दिया जा सकता. ये तो हुई ‘जलीकट्टू’ की बात जिस पर रोक हटाने अब विधेयक भी पास हो गया.लेकिन अब हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ के किसानो का पारंपरिक पर्व ‘पोरा’ या ‘पोला’ की.  अगस्त महीने में खेती किसानी का काम खत्म हो जाने के बाद भाद्र पक्ष की अमावस्या को यह त्यौहार मनाया जाता है.पोला त्यौहार के संबंध में मान्यता है कि इस दिन अन्नमाता गर्भ धारण करती है इसलिए यह त्योहार मनाया जाता है. इस दिन लोगों को खेत जाने की मनाही होती है बैलों सहित सभी कृषि उपकरणों को  इस दिन आराम दिया जाता है.बैलों सजाधजाकर उसकी सेवा-पूजा की जाती है.  इस दिन हर घर में विशेष पकवान बनाये जाते हैं जैसे ठेठरी, खुर्मी. इन पकवानों को मिट्टी के बर्तन, खिलौने में पूजा करते समय भरते हैं ताकि बर्तन हमेश अन्न से भरा रहे. ऐसा नहीं है कि इसदिन बैलों से नहीं खेला जाता यहाँ भी बैलों से खेलने की परंपरा है लेकिन ये बैल मिट्टी के होते हैं. अब ये परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है जिसे सहेजने की जरूरत दिखाई देती है लेकिन इस पर विधेयक तो दूर कोई सरकारी सहयोग भी नहीं मिलता जिससे इस बैलों के प्रति कृतज्ञता के पर्व को संरक्षित किया जा सके.

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