छत्तीसगढ़ के जनधन खातों में क्यों नहीं है धन?

एक तरफ देशभर में नोटबंदी के बाद जनधन खातों में कालाधन जमा होने की खबरें आ रही हैं साथ ही छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित क्षेत्र में नक्सलियों द्वारा जनधन खातों में बड़ी रकम जमा कराने जैसी शिकायत भी सुनने में आ रही है। लेकिन आंकड़ों की मानें तो गरीबों के लिए खुलवाए गए जनधन खातों की हालत नोटबंदी के इतने दिन बित जाने के बाद भी छत्तीसगढ़ में काफी कमजोर बनी हुई है। लेकिन इन आंकड़ो पर राज्य सरकार कोई बात करती नहीं दिखाई दे रही है।
प्रधानमंत्री जन धन योजना की वेबसाइट पर जारी आंकड़ो के अनुसार 30 नवंबर तक छत्तीसगढ़ में जनधन खातो की संख्या 1 करोड़ 19 लाख 14 हज़ार 626 है लेकिन इनमें से 39 लाख 32 हजार 844 खातों में एक भी पैसा नहीं है।

हाँ यह सच है कि नोटबंदी के शुरूआती चार हफ्तों में कुल 428 करोड़ रुपये जमा हुये हैं।पहले दो हफ्तों में इन खातों में 402 करोड़, तीसरे हफ्तें में 21 करोड़ तथा चौथे हफ्तें में 5 करोड़ जमा कराये गये हैं।
7 दिसंबर की स्थिति में राज्य में 1 करोड़ 19 लाख 39 हजार 534 जनधन खातें है, 9 नवंबर को यही संख्या 1 करोड़ 18 लाख 48 हजार 318 की थी।नोटबंदी के बाद 91 हजार 216 नये खातें भी खोले गए हैं। इनमें से 59 हजार 322 खातें शहरों में खोले गये हैं। नोटबंदी के पहले जनधन खातों में 14 सौ 18 करोड़ 89 लाख रुपये थे। अब यह बढ़कर 18 सौ 47 करोड़ 18 लाख रुपये के हो गए हैं।पहले दो हफ्तों में शून्य बैलेंस वाले 14 हजार से ज्यादा खातों में 402 करोड़ रुपए जमा कराये गए हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यहाँ ये है कि पूरा हो हल्ला यहाँ इन्हीं खातो को लेकर हो रहा है जबकि 39 लाख 32 हजार 844 खातों में एक भी पैसा नहीं है।
छत्तीसगढ़ में सभी जनधन खातों में जमा रकम कुल 1842.86 करोड़ रूपए है यानी इस तरह हर खातों में औसतन 1547 रूपय जमा हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इन आंकड़ो की जांच-परख करें तो पता चलता है कि 9 नवंबर तक देश में जीरो बैलेंस वाले खातों की संख्या 5 करोड़ 93 लाख 67 हजार 309 थी। 30 नवंबर तक इनमें से केवल 452561 खाते ऐसे थे जिनमें रकम जमा कराए गए इस तरह नोटबंदी की घोषणा के बाद से 30 नवंबर तक जीरो बैलेंस वाले केवल 0.76 प्रतिशत खातों में ही पैसे डाले गए।
यह आंकड़े इसलिए भी बहस का विषय होना चाहिए क्योंकि पूरे देश में खोले गए जनधन खातों में 22.84 प्रतिशत खाते जीरो बैलेंस वाले हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसे जीरो बैलेंस वाले खातों की संख्या पूरे देश में सबसे अधिक 32 फिसदी है।
लेकिन बहस के मूल में ये ना होकर वे आंकड़े सुर्खियाँ बंटोरते दिख रहे हैं जिसके मुताबिक प्रदेश के एक करोड़ 18 लाख जनधन खातों में 1820 करोड़ रूपए जमा हुए हैं बताया जा रहा है कि इसमें 550 करोड़ रूपए 11 नवंबर से 30 नवंबर तक की अवधि में जमा हुए हैं।इस पर आयकर विभाग ने तुरंत कार्यवाई करना भी शुरू कर दिया है।
ठीक वैसे ही नक्सलियों के द्वारा जनधन खातों के इस्तेमाल को भी सरकार गंभीरता से ले रही है लिहाजा माओवादियों का पैसा जनधन खातों में जमा कराने के संदेह के मद्देनजर सरकार चौकन्नी हो गई है।इस पर राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा का कहना है ‘’कि सभी जिलों में अधिकारियों को जनधनखातों पर नज़र रखने के लिए कहा गया है। माओवाद प्रभावित इलाकों में खासतौर पर इन खातों की जाँच पड़ताल के लिए कहा गया है। हम यह मान रहे हैं कि इन खातो में कालाधन जमा करने की कोशिश हो रही है।‘’
लोगों का कहना है कि ये सब सरकार जानबूझकर कर रही है ताकि उन्हें छत्तीसगढ़ की गरीबी पर कोई सफाई ना देनी पड़े।
परिणामस्वरूप जनधन खातो में छत्तीसगढ़ की जैसी भी स्थिति हो लेकिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि ‘’छत्तीसगढ़ कैशलेस लेनदेन में अग्रणी राज्य बनेगा। दिसंबर माह के अंत तक प्रदेश के दस लाख लोगों को इसके लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।‘’
लेकिन विपक्ष और अन्य किसान नेता इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते उनके अनुसार सरकार का यह फैसला मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए किया गया है।
एक वेबसाइट से बात करते हुए किसान नेता आनंद मिश्रा सरकार पर आरोप लगाते हैं कि ‘’नोटबंदी के पूरे फैसले में गरीब आदमी प्रताड़ित हो रहा है जबकि सरकार खुद ही काले धन को सफेद धन में बदलने के कदम बता रही है, ध्यान पलटने के लिए जनधन खाता और कैशलेस इकॉनमी की बात हो रही है।‘’
आनंद मिश्रा ने ये भी आरोप लगाया कि ‘’प्रधानमंत्री मोदी ने मुरादाबाद की रैली में भी जनधन खातो को लेकर बात की लेकिन वो उन उद्योगपतियों और नेताओं की बात नहीं कर रहे हैं जिनके पास कालाधन है।‘’

छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के नेता और विधानसभा सदस्य अमित जोगी का कहना है कि ‘’जनधन योजना के अधिकतर खाते इसलिए शून्य हैं क्योंकि सबसे अधिक गरीब छत्तीसगढ़ राज्य में हैं, उसमें भी राज्य सरकार ने मनरेगा के अंतर्गत काम करने वाले मजदूरों के 650 करोड़ रूपए रोककर रखा है। अगर सरकार किसानों के कर्ज माफ कर दे,माल्या जैसे लोगों को पैसा ना देकर इसे गरीबों,मजदूरों और किसानों के खातों के लिए सुनिश्चित कर दे तब इसे कालेधन के खिलाफ लड़ाई मानी जाएगी।‘’
कैशलेस इकॉनमी के सवाल पर जोगी कहते हैं कि ‘’पहले सरकार गरीबों के खातों तक रूपए पँहुचाए फिर इसकी बात करे।‘’
इन आंकड़ो के प्रकाश में आने के बाद अब विपक्ष ने सरकार को घेरने का मन बना लिया है। कांग्रेस की राज्यसभा सांसद छाया वर्मा कहती हैं कि ‘’सिर्फ जनधन खाता खुलवाने से कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि मनरेगा जैसी योजनाओं के सही तरीके से क्रियान्वयन करने के बाद गरीब जनता के पास कुछ धन आ पाएगा,इस पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।‘’
हाँलाकि भाजपा के लोकसभा सदस्य लखनलाल साहू का मानना है कि ‘’शून्य बैलेंस वाले खाते की वजह जागरूकता की कमी है। सरकार पूरी कोशिश कर रही लोगों को भी परंपरागत लेनदेन को छोड़कर बैंक प्रणाली में रूची दिखानी चाहिए।‘’
लखनलाल साहू आगे कहते हैं कि ‘’आप छत्तीसगढ़ के साथ पुनर्गठित हुए उन दो राज्यों की तुलना करेंगे तो आप पाएंगे कि छत्तीगढ़ कहीं ज्यादा आगे है।13 सालों में यहां की स्थिति काफी बेहतर हुई है।‘’
अब देखना होगा कि छत्तीसगढ़ सरकार कैशलेश इकॉनमी के साथ-साथ शून्य बैलेंस वाले जनधन खातों के लिए क्या उपाय करती है।

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