अक्सर गाड़ी के पहिए पर कुत्ते क्यों सूसू करते हैं?

(एक गहन विश्लेषण)

अपनी पारखी नज़र को अपनी उंगलियों के वाइपर से साफ कर यहाँ-वहाँ निहारने पर अपने ही गोले में दतनिपोरी की हद तक भौच्चक कर देने वाली चीज़े मिल जाती हैं….. बात तो सही है साथी लेकिन फटेहाल भागमभाग वाले इस जमाने में अब पहले जैसे फुरसतिए कहाँ रहे जो ठेलमपेल में पड़े बिना अमूल्य ज्ञान का रायता गटक जाए और खाली टाईम का सदुपयोग कर हमारे मन मस्तिष्क में पवित्र विचारो का रायता फैलाए, अपच होने की हद तक ज्ञान पेले…इसे ही आगे चलकर मतलब कालांतर में सभी अबोध और गुणीजन इन्हीं महापुरूषों की बदौलत ज्ञान बघारते नजर आएं…

इसे विडंबना ही कहिए कि आज आदमी चाँद, मंगल पर पहुँच गया लेकिन ग्रह बाधा की शांति के लिए उन्हीं मंत्रों और टोटकों का सहारा ले रहा है जिसे हमारे पूर्वज मजाक में हँसते-हँसते बक दिए थे। इसके बरक्स हम अपनी बुद्धी की लुटिया देखें तो सूखा ठनठन गोपाला लगता है। गौतम बुदध जी कहते थे कि देशाटन करो घूमो-फिरो ये ज्ञान अर्जित करने का सबसे सुंदर उपाय है…..मगर हम तो इस उच्च विचार के इर्द-गिर्द भी नहीं मंडरा सके हैं उल्टा इस पर अमल करने वाले नमो को गरियाने लगे…कि बड़ा ‘घुम्मकड़ है….’ ‘लापता है…’ ‘ देश लौट आओ’ ना जाने क्या-क्या सही मायनों में हमारे घुटनों में यदि बुद्धी होती तो हम ये बिल्कुल नहीं करते बल्कि घुटनों के बल पर ही पूरी दुनिया नाप लेते।

चलिए अब वक्त मिला ही है तो दुनिया ना सही सड़क ही नाप लेते हैं…कौन जाने कब एंटी क्लॉक वाइस चलकर समय का पहिया हमको पूरी दुनिया घूमा दे …. पहिए से याद आया कि ये पहिया ही है जो घूम-घूम कर हमको आदिम से आधूनिकता के जमाने तक की सैर कराने में अहम भूमिका निभाता रहा है।
इसकी ही बदौलत आज हम कार, बाइक में फर्राटे भर रहे हैं। लेकिन अफसोस कि आज तक हम यह पता नहीं लगा पाए कि बाइक या कार के पहिए पर ही क्यों कुछ कुत्ते सूसू करते हैं… यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुत्ता और पहिया दोनों ही मानवों का साथी रहा है.. ऐसे मे दोनों का सतत फसाद अच्छे अच्छों का माथा ठनका सकता है। कुछ बुद्धिजीवी इस पर भी चर्चा कर सकते हैं कि कुत्ता और पहिए के सूसूआपे संबंध का कोई वैज्ञानिक या ग्रह संबंधी कारण तो नहीं है।

मैंने जिस पारखी नजर का जिक्र ऊपर किया है…यदि आपके गटारन मल्लब आँखों मे इतनी शक्ति हो तो आप भी इस सूसूआपे (सूसू कर्मकी प्रवृत्ति) संबंध पर गौर कर सकते हैं कि किस तरह मौका मिलते ही कुत्ता अर्थात श्वान जी अराम से पैर टिकाकर पहिए का अभिषेक करने का पुनीत कार्य करते हैं। इस काम में उन कुत्तों की तल्लीनता देखकर इसे पुनीत कर्म ही कहा जा सकता है।
कुछ भक्त जन इसे मोदी के पील्ले और गाड़ी के नीचे आने वाले बयान से भी जोड़कर देखते हैं कि उस बयान से अभीभूत मतलब अत्यंत खुश होकर उस बयान की याद को ताजा रखने के लिए कुत्ते पहिए पर कुतृम (कृत्रिम का कुत्ताकरण)बारिश का प्रयोग करते हैं, हालाँकि ये भक्तजनों का अंधविश्वास भी हो सकता है क्योंकि ये सतत सूसूआपे की प्रक्रिया अंग्रेजी शासनकाल से चली आ रही है।

इतिहासकारों के मुताबिक अंग्रेजो के भारत पाँव पसारने के बाद उनकी आधूनिक गाड़ियों के चक्के भी यहाँ सरपट भागने लगे थे।एक ओर जहाँ भारत में अपेक्षाकृत अहिंसक धीमीगति से चलने वाली बैल गाड़ी और भैंस गाड़ी की पावन परंपरा थी वहीं अंग्रेजो के फर्राटे भरते माँसाहारी गाड़ियों ने कुत्ता जगत में अफरातफरी मचा दी जिसके कारण इन्हें विरोध के लिए उस समय की पंरपंरा के अनुसार सत्याग्रह का रास्ता चुनना पड़ा और पहिए पर सूसूकर्म कर अपना विरोध दर्ज कराने की परपंरा चल पड़ी। कहा जाता है कि एक ओर अच्छे अच्छे गाँधीवादियों ने भी सत्याग्रह का मार्ग छोड़ दिया लेकिन ये कुत्ते अभी तक उस सतत प्रक्रिया को अंजाम दे रहे हैं।

हांलाकि मेरा एक दोस्त एक और दिलचस्प वजह बताता है जो इन कुत्तों के परोपकार की भावना को प्रगट करता है वह कहता है कि ये कुत्त्ते किसी भी कारण से सूसू करे लेकिन मान्यता ये है कि कुत्तों का गाड़ी के पहिए पर सूसू करना बहुत शुभ होता है…गाड़ी का एक्सीडेंट नहीं होता…
अब मैं इतने ज्ञान पेलने के बाद बदले में आप लोगों से यही गुरूदक्षिणा की मांग कर सकता हूँ कि आपकी गाड़ी के नीचे कोई कुत्ता कभी ना आए इसका विशेष ख्याल रखें और कोई कुत्ता आपकी गाड़ी के पहिए पर सूसू कर्म करता है तो उसे दिलखोल कर करने दें इसी मे हम सब की भलाई है….

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