ऑनलाइन दुकानों के सामने परम्परागत दुकानें कब तक टिकी रह पाएंगी?

गाँव हो कस्बा हो या महानगर छोटे बड़े दुकानों की मौजूदगी एक रिवायत की तरह लम्बे समय से रही है। आम आदमी की ज़रूरत के तमाम सामान लाला जी की तराजू के पड़ले से होकर ही उपभोक्ताओं तक पहुँचता रहा है। ग्राहकों और दुकानदारों के मोलभाव की प्रक्रिया से बने सम्बंध अब तक मजबूत रहे हैं, लेकिन बाजार के बदलते स्वरूप ने इन संबंधो और पारंपरिक दुकानों को लेकर एक बहस खड़ी कर दी है। बहस की वज़ह पारम्परिक दुकानों के समक्ष ऑनलाइन मार्केट का आगमन और उसके बढ़ते क्रेज को माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि ऑनलाइन मार्केट के विस्तार से पारम्परिक दुकानों की चमक फीकी हो सकती है साथ ही भविष्य मे इनके अस्तित्व के लिए भी खतरा पैदा हो सकता है।

हालांकि अभी रिटेल मार्केट 500 अरब डॉलर का है जबकि ऑनलाइन रिटेल मार्केट 50,000 करोड़ का है लेकिन खतरे का अंदेशा इसलिए भाँपा जा रहा है क्योंकि रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के अनुसार 2007-08 से अब तक ई-रिटेल में हर साल 56 फीसदी की वृद्धि देखने को मिली है। माना जा रहा है कि अगले 3 साल तक सालाना 50-55 प्रतिशत ग्रोथ की उम्मीद है। क्रिसिल के इस अध्ययन के अनुसार बीते पांच साल के दौरान पारम्परिक रीटेलरों की बिक्री लगभग 24 फीसदी सालाना के हिसाब से बढ़कर करीब 70 हजार करोड़ रु प्रतिवर्ष के आंकड़े पर पहुँची है। ग्रोथ रेट के हिसाब से कुछ लोग इसे ऑनलाइन मार्केट के लिए अच्छा तो मान ही रहे हैं साथ ही पारम्परिक दुकानों के लिए खतरे की घंटी भी कह रहे हैं। अभी ई-कॉमर्स का कुल बाजार 50,000 करोड़ रुपये का है एक अनुमान के मुताबिक 2025 में ई-कॉमर्स का कुल बाजार 4 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा और ई-रिटेल का बाजार 2 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। जिसका प्रभाव पारम्परिक रिटेल मार्केट पर देखे जा सकने की भरपूर संभावना बताई जा रही है।

इस समय हमारे देश में लगभग 1.40 करोड़ दुकानें हैं और जीडीपी में रिटेल का हिस्सा 15 फीसदी है। रिटेल उद्योग 500 अरब डॉलर का है, लेकिन 92 फीसदी रिटेल असंगठित है। जबकि ई रिटेल में एक साथ खूब सारे उत्पादों की मौजूदगी और प्रति दिन नए-नए ब्रांड्स के अलावा आकर्षक डिस्काउंट और लुभावने ऑफर्स की भरमार होती है। इसमें कैश ऑन डिलिवरी और उत्पादों को बदलने की सुविधा उपलब्ध होने से ग्राहक इस ओर भागे जा रहे हैं। ऐसे में अब पारम्परिक विक्रेताओं को इस चुनौती का सामना करने के लिए अपनी व्यापारिक संरचनाओं में काफी बदलाव करने पड़ेंगे ताकि ग्राहकों को अपनी दुकानों पर रोका जा सके।
गाजियाबाद के निशांत राय मोबाइल खरीदने के लिए ऑनलाइन शापिंग साइट को प्राथमिकता इसलिए देते हैं क्योंकि उन्हें इस साइट पर बहुत सारी वैराइटियां आसानी से मिल जाती है साथ ही चुनने में भी आसानी होती है।
ऐसे उदाहरणों से इन तर्कों को काफी संबंल मिलता है कि जैसे-जैसे ऑनलाइन मार्केट का विस्तार नगरों-महानगरों से कस्बों तक होगा तब फुटकर दुकानों के लिए काफी गंभीर हो जाएगा।

हालांकि दूसरे पक्ष का तर्क सामान्य रिटेल मार्केट को थोड़ी ठण्डक पँहुचा सकती है जिसमें कहा जा रहा है कि अधिकतर ई-रिटेल साइट घाटे में है। ई-रिटेल के ग्राहकों की संख्या तो बढ़ी लेकिन इसमें केपिटल की कमी दिख रही है । दरअसल ऑनलाइन साइट चलाने की लागत अधिक है इसलिए यहाँ निवेश की भी काफी कमी है।ई-कॉमर्स में एफडीआई को लेकर भी नीति स्पष्ट नहीं है और ई-रिटेल की कस्बों और गांवों तक पहुंच नहीं है।

इसके अलावा एसोचैम की रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘’2017 तक उपभोक्ताओं द्वारा किया जाने वाला खर्च आज के मुकाबले चार गुना बढ़कर 4.2 खरब डॉलर के आंकड़े तक पहुंच सकता है।‘’ गौरतलब ये है कि उपभोक्ताओं के अधिकतर खर्च खाद्य उत्पादों में होते है सब्जी, मांस और फल जैसे पदार्थ जो जल्दी खराब हो जाते हैं उस पर सामान्य रीटेलरों का प्रभुत्व बना हुआ है,अभी ऑनलाइन रीटेलरों को इस पर फतह के लिए उपाय करने होंगे क्योंकि आम उपभोक्ताओं के द्वारा 50 फीसदी खर्च इन्हीं मदों में होते हैं। हमारे देश में कुल उपभोक्ता खर्च का सिर्फ 18 फीसदी ही इलेक्ट्रॉनिक्स या फर्नीचर जैसे क्षेत्र से आता है।
आर्थिक मामलों के पत्रकार निमिष कुमार कहते हैं कि ‘’सक्रीय उपभोक्ता जिनकी आयु 18 से 35 है वे पारपंरिक रीटेलरों से छुटते जा रहे हैं,साथ ही स्मार्ट फोन के विस्तार से ये सिलसिला और बढ़ता जाएगा।पारपंरिक रीटेलर बने तो रहेंगे लेकिन उनके हाथों में सिर्फ चिल्हर होगा बाकी बड़ी राशियाँ ऑनलाइन मार्केट के हिस्से में आएंगी।‘’आगे वे कहते हैं कि ‘’इसका प्रभाव सबसे ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार पर पड़ेगा जबकि खाद्य वस्तुओं के बाज़ार पर इसका कोई खास असर नहीं होगा।‘’ साथ ही वे इसमें जोड़ते हैं कि पारंपरिक रीटेलरों को इसका विकल्प तैयार करने के लिए सोचना चाहिए।‘’
ऐसे में फिलहाल पारम्परिक रीटेलरों को बहुत ज्यादा घबराने की ज़रूरत नहीं है लेकिन आगे आने वाली चुनौतियों के लिए खुद को बदलने और तैयार रहने की ज़रूरत तो है ही।

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