फसल बीमा से आखिर क्यों चौपट हो रही हैं फसलें?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरूआत करते हुए कहा था कि जो लोग सुबह शाम मोदी को किसान विरोधी बताकर कोसते थे,वे भी फसल बीमा योजना की आलोचना नहीं कर पा रहे हैं।क्योंकि यह योजना किसानों की सभी समस्याओं का समाधान करेगी।लेकिन कुछ किसानों को लाखो के नुकसान के बदले महज चंद रूपयों की क्षतिपूर्ति दिए जाने जैसी घटनाएँ किसानों के लिए लागू की गई प्रधानमंत्री की इस महत्वाकांक्षी योजना पर सवाल उठा रही है।
छत्तीसगढ़ के तिल्दा के निकट सासाहोली गाँव में एक किसान हरिराम यदु के द्वारा दो एकड़ में लगाया गया धान खराब हो गया था जिसकी क्षतिपूर्ति के तौर पर बीमा कंपनी द्वारा सिर्फ 7 रूपए 38 पैसा दिया गया। जबकि हरिराम यदु को उम्मीद थी कि धान लगाने का पैसा तो कम से कम मिल जाएगा।
ऐसा नहीं कि यह पहला मामला है बल्कि इस घटना के पहले भी इस किस्म के मामले सामने आ चुके। छत्तीसगढ़ के कटघोरा के रंगबेल गाँव के कृषक दिलराज सिंह को पाँच हेक्टेयर से अधिक जमीन होने के बाद भी महज 40 पैसा मुआवजा दिया गया। वहीं कटघोरा के खैरभवना के एक और किसान को ढ़ाई एकड़ की उपज खराब होने के एवज में 18 रूपए का भुगतान किया गया। वहीं कोरिया जिले के मनेन्द्रगढ़ में रहने वाले मनोहर साय को जून में महज 25 रूपए थमा दी गई थी। बताया जा रहा है कि राज्य में ऐसे किसानो की अच्छी खासी तादात है जिनको फसल बीमा के रूप में 5 रूपए जैसे मामूली रकम का भुगतान किया गया।
जबकि छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के अफसर बता रहे हैं कि इस साल प्रदेश में 13 लाख 66 हजार 302 किसानों को बीमा के दायरे में लाया गया है। इसमें 12 लाख 9 हजार 357 ऋणि किसान और एक लाख 56 हजार अऋणि किसान हैं जिन्हें सरकार के प्रयासों द्वारा इस योजना का बखूबी लाभ दिया जा रहा है।
किसानों को इस तरह कम मुआवजा देने का वाकया ना सिर्फ छत्तीसगढ़ में बल्कि मध्यप्रदेश, हरियाणा और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में भी सामने आ चुका है।
भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस योजना को पूर्ववर्ती सरकारों की अपेक्षा अधिक कारगर बताया है लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में घट रही ऐसी घटनाएँ और किसानों का इस योजना के विरूद्ध प्रदर्शन इस योजना को सिरे से नकारते नजर आ रहे हैं। पंजाब सरकार ने जहाँ इसे लागू करने से मना किया था वहीं उत्तरप्रदेश,हरियाणा के किसान फसल बीमा के खिलाफ लगातार विरोध दर्ज करा रहे हैं।

राज्यसभा सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कुमारी शैलजा कहती हैं कि ‘’फसल बीमा योजना किसानों के साथ एक धोखा है,इससे किसानों को लाभ होने वाला नहीं है। जब किसान नहीं चाहते तो इसे जबरन लागू नहीं किया जाना चाहिए।‘’ उन्होंने सवाल उठाया कि ‘’केन्द्र सरकार इस योजना के तहत कुछ कंपनियों को लाभ तो नहीं पँहुचाना चाह रही है?’’

अगर इस नजरिए से देखें तो राष्ट्रीय कृषि बीमा के अनुसार खरीफ 2007 से खरीफ 2014 तक 8 सालों में किसानों ने 8083.45 करोड़ रूपए प्रीमियम और सरकारी सब्सिडी 1132.68 करोड़ रूपया मतलब कुलमिलाकर 9216.13 करोड़ रूपया बीमा कंपनियों के पास जमा हुआ जिसमें 27.62 प्रतिशत बीमित किसानों को 27146.78 करोड़ रूपए की भरपाई की गई जिसमें कंपनियों सिर्फ 7232.26 करोड़ दिए। बाकी 19914.52 करोड़ की भरपाई सरकार द्वारा की गई।
वैसे ही छत्तीसगढ़ में साल 2014-15 सरकार ने बीमा करने का जिम्मा सात निजी कंपनियों को दिया था जिसमें कुल 97,4199 किसानों ने करीब 17 लाख हेक्टेयर जमीन की फसल का बीमा कराया था जिसमें सात बीमा कंपनियों को 3.35 अरब रूपए से ज्यादा राशि का प्रीमियम भुगतान किया गया था। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के कुछ गाँव छींदडांड़, धौराटिकरा,कंटनपुर और पटना के आंकड़ो को देखें तो यहाँ के 3,429 किसानों को 25 रूपय प्रति हेक्टेयर की दर से 1 लाख 27 हजार 336 रूपय 75 पैसे का भुगतान किया गया।
वैसे ही मध्यप्रदेश के सहडोल संभाग में 44,654 किसानों ने साल 2014-15 और 2015-16 में बीमा कराया था।जहां अधिक वर्षा होने से पूरे संभाग की फसल बर्बाद हो गई थी लेकिन संभाग के सिर्फ 4469 अर्थात कुल 10 फीसदी किसानों को ही बीमा की राशि मिल सकी।

हाँलाकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ये भी कहा था कि ‘’किसानों का पिछली सरकार की बीमा योजना में यकीन नहीं था,यही कारण है कि 20 प्रतिशत किसान भी बीमा नहीं कराते थे।इस चुनौती का सामना करते हुए यह योजना बनाई गई है।पुरानी योजना में व्यापक बदलाव किया गया है।‘’

लेकिन किसानों के लगातार इस योजना से मोहभंग होने से प्रधानमंत्री की बदलाव की बात गले नहीं उतर रही है।
किसान नेता आंनद मिश्रा मीडिया को जानकारी देते हुए कहते हैं कि ‘’किसानों की फसल बीमा मामले की जाँच एसआईटी से करवाई जानी चाहिए,अगर सरकार यह पहल नहीं करेगी तो हन अदालत का सहारा लेंगे।‘’ साथ ही आंनद मिश्रा दावा करते हैं कि ‘’अगर पिछले सोलह सालों में लागू इस तरह की फसल बीमा योजनाओं की जाँच करवा ली जाए तो कई अरब रूपय का घोटाला सामने आएगा।‘’
कई किसानों की ये भी मांग है कि फसल बीमा योजना अनिवार्य रूप से लागू हो लेकिन इसकी प्रीमियम की राशि सरकार द्वारा भरी जाए साथ ही जीविकोपार्जन के लिए भी राशि दी जाए। किसान को उसके संभावित उपज के आधार पर मुआवजा दिया जाए।
2004 में सरकार द्वारा गठित किसान आयोग की रिपोर्ट में भी सलाह दी गई थी कि ‘छोटे मझोले लघु सीमांत किसानों की प्रीमियम की राशि सरकार द्वारा अदा की जानी चाहिए।‘

वहीं हरियाणा और उत्तरप्रदेश के किसान नेता सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान को अलग कर दिया गया है।जबकि किसानों को इन्हीं वजहों से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है।
इसके अलावा ये भी कहा जा रहा है कि किसानों के दावों को जब कंपनिया नकार देती हैं तब इसके क्रॉस चेकिंग के लिए भी सरकार के पास कोई प्रबंध नहीं है।इसलिए निजी कंपनियाँ अपनी मनमानी पर उतर आई हैं।
छत्तीसगढ़ के एक किसान संतोष दुबे का कहना है कि ‘‘ भले ही मैं अब तक इस योजना की खामियों का शिकार नहीं हुआ हूँ लेकिन अब इस योजना से मुझे कोई उम्मीद नहीं है।‘’
ऐसी घटनाओं और खामियों के चलते ना केवल किसान संतोष,हरिराम और दिलराज की उम्मीदें टूटी है बल्कि अपनी फसल की क्षति की भरपाई के लिए प्रधानमंत्री की ओर देख रहे लाखों किसानों की उम्मीद भी इस योजना की असफलता से धराशाई होती दिख रही है।

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