क्या छत्तीसगढ़ में भी दलित आंदोलन की आवश्यकता है?

भले ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह अपनी सरकार को दलितों और आदिवासियों का ध्यान रखने वाली बता रहे हों लेकिन नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो  के आंकड़ों की बानगी इसके विपरीत है। हाल ही में नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो के द्वारा जारी किए अपराध संबंधी रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति एक लाख दलित आबादी के खिलाफ अपराध की राष्ट्रीय दर 22.3 है,लेकिन छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 31.4 है। वहीं आदिवासियों के खिलाफ अपराध की दर भी छत्तीसगढ़ में 19.4 है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर 10.5 है।

जानकारों का कहना है कि ये वो आंकड़े है जो पंजीबद्ध हो पाते हैँ जबकि पाँच गुणा से अधिक मामले दूर गाँव और जंगलों में ही दम तोड़ देते हैं।इस रिपोर्ट में एक और तथ्य सामने आया है जिसमें 2015 में छत्तीसगढ़ में एससी-एसटी एक्ट के तहत एक भी प्रकरण दर्ज नहीं हुआ।जानकारो के अनुसार इसका यह मतलब नहीं है कि कि यहाँ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अपराध नहीं हो रहे हैं बल्कि इसका आशय यह है कि जानबूझकर एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज नहीं किया जा रहा है। रिपोर्ट में एक और तथ्य उजागर हुआ है जिसकी चर्चा भी की जा रही है कि अमूमन सभी भाजपा शासित राज्यों में एससी-एसटी एक्ट का प्रयोग नहीं होने से दलितों पर अत्याचार के मामले सामान्य कानून के तहत दर्ज किए जा रहे हैं जिससे मुवावजा भी नहीं मिलता और दोषियों को कड़ी सजा भी नहीं मिलती।

उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक रह चुके एस.आर दारापुरी कहते हैं कि ‘’इस एक्ट को भाजपा शासित राज्यों तथा अन्य राज्यों में लागू ही नहीं किया जा रहा है। गुजरात का दलित आक्रोश इसी की परिणति है।ऐसी परिस्थिती में दलितों को इस संबंध में गंभीरता से मनन करना चाहिए। और एससी एसटी एक्ट को सख्ती से लागू करने के लिए जनआंदोलन करना चाहिए।‘’

यह आंकड़े छत्तीसगढ़ के लिए इसलिए भी निराशाजनक है क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य का गठन आदिवासियों और दलितों की स्थिति में सुधार लाने के मद्देनजर किया गया था।हालांकि राज्य सरकार इसे अपनी विफलता मानने से लगातार इंकार कर रही है, केन्द्रीय खनन और इस्पात राज्यमंत्री विष्णुदेव साय कहते हैं कि ‘’दलित और आदिवासी जितने खुश अभी हैं,उतने वे कभी नहीं थे।‘’

अनुसुचित जाति आयोग छत्तीसगढ़ के पूर्व अध्यक्ष सी.डी खाण्डेकर भी राज्य की वर्तमान स्थिति को पहले से बेहतर बता रहे हैं वे कहते हैं  ‘’कि अब पहले जैसा अत्याचार नहीं होता, अटल जी के प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने गांव-गांव तक प्रशासन की पहुँच बना दी है । अधिकतर मामले आपसी रंजिश के होते हैँ। छिटपुट कुछ घटनाएं भी अब रमन सरकार की नेतृत्व में थम जाएगी।‘’

लेकिन पिछले वर्ष दलितों पर देश भर में 45,003 अपराध हुए हैं और छत्तीसगढ़ में यह संख्या 1028 है।2015 में दलितों के खिलाफ आगजनी के कुल 179 मामले पंजीबद्ध किए गए थे,राष्ट्रीय दर के हिसाब से यह 0.1 है लेकिन छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 43 और दर 0.3 जो सबसे अधिक है।

आदिवासियों की स्थिति भी छत्तीसगढ़ में चिंताजनक बनी हुई है।देश भर आदिवासियों के खिलाफ हुए 10914 मामलों में से 1,518 मामले छत्तीसगढ़ के हैं। दलितों और आदिवासियों के मुद्दे पर रमन सिंह को  कांग्रेस और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस घेरती रही है लेकिन इस रिपोर्ट के आने के बाद दिल्ली में सरकार चला रही आम आदमी पार्टी भी काफी उत्तेजित हो गई  है। दिल्ली  से बाहर पार्टी के  विस्तार के सिलसिले में छत्तीसगढ़ आए दिल्ली के श्रम एवं परिवहन मंत्री गोपाल राय ने कहा कि ‘’छत्तीसगढ़ की रमन सरकार आदिवासियों के खिलाफ दमनकारी रणनीति के तहत काम कर रही है। मुख्यमंत्री को आँखे खोलकर काम करना चाहिए।‘’

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ऐसी घटनाओं का  प्रमुख कारण आंदोलन की कमी को मानते हैँ। स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि ‘’जिस तरह उना में दलितो का आंदोलन हुआ वैसे ही एक आंदोलन की आवश्यकता छत्तीसगढ़ में भी है। जिस दिन प्रभावशाली आंदोलन छत्तीसगढ़ में शुरू हो गया ऐसे मामलों में कमी आ जाएगी।‘’ स्वामी इसमें आगे जोड़ते हैं कि ‘’पहले हम लोगों ने शंकर गुहा नियोगी के साथ आंदोलन शुरू किया था लेकिन उनकी हत्या करवा दी गई। अब छत्तीसगढ़ की स्थिति और भी चिंताजनक है।‘’

दलित मामलों के जानकार और पत्रकार अनिल चमड़िया छत्तीसगढ़ में अन्य राज्यों के मुकाबले सामाजिक चेतना और जागरूकता का अभाव को जिम्मेदार ठहराते हैं। वे कहते हैं कि ‘’सामाजिक चेतना की कमी की वजह से राष्ट्रवाद के नाम पर एक विशेष वर्ग पर आक्रमण होता रहता है। अनकी आवाज का विस्तार नहीं होने की वजह से ऐसी घटनाए बढ़ती जाती है, विशेषकर छत्तीसगढ़ में कोई समूह सक्रिय नहीं है जिनकी  आवाज की पहुँच राष्ट्रीय स्तर पर हो।‘’ अनिल चमड़िया आगे कहते हैं कि ‘’दलितों आदिवासियों के खिलाफ हो रहे मामलों में छत्तीसगढ़ ही इकलौता प्रदेश नहीं है बल्कि भाजपा साशित अन्य राज्यों में भी यही स्थिति है।‘’

दलितों पर वर्ष 2015 में घटित अपराधों में से 22.3 की राष्ट्रीय दर के उलट राजस्थान 57.2, आंध्रप्रदेश 52.3, गोवा 51.1, बिहार 38.9 , मध्यप्रदेश 36.9 उड़िसा 32.1, छत्तीसगढ़ 31.4,तेलंगाना 30.9, गुजरात 25.7 केरल 24.7 उत्तरप्रदेश 20.2 रही। ये आंकड़े भी भाजपा शासित राज्यों राजस्थान,मध्यप्रदेश,गुजरात,छत्तीसगढ़, गोवा में दलितों पर हो रहे अत्याचार की ऊँची दर को रेखांकित कर रहा है। जिसे  भाजपा शासित राज्यों में  दलितों और आदिवासियों की असुरक्षित स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं उना में हुए दलित आंदोलन के बाद  एनसीआरबी की इस रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ समेत भाजपानीत राज्यों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

कांग्रेस की राज्यसभा सांसद छाया वर्मा इसे भाजपा सरकार की सबसे बड़ी विफलता मानती है वे कहती हैं कि ‘’सरकार की जिम्मेदारी एक भयमुक्त और अपराध विहीन समाज बनाने की है लेकिन ये तो दूर की बात है भाजपा सरकार में दलित और आदिवासी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने से भी डरते हैं  इसका खामियाजा भाजपा को आने वाले चुनाव में भुगतना पड़ेगा।‘’

 

 

 

 

 

 

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