राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों की मलेरिया से हो रही है मौत

राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले संरक्षित जनजाति पहाड़ी कोरवा ज़िंदगी और मौत से जूझते दिखाई दे रहे हैं, विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में रहने वाली इस जनजाति पर मलेरिया जैसी बीमारियों का संक्रमण फैला हुआ है जिसके चलते कई पहाड़ी कोरवाओं की मौत हो चुकी है।

विलूप्त होने की कगार पर पहुंची इस जनजाति के संरक्षण के लिए भारत के राष्ट्रपति ने इन्हें गोद लिया है लेकिन आए दिन मलेरिया से हो रहीं मौतों ने पहाड़ी कोरवाओं को संकट में डाल दिया है।
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के निक़ट कई आदिवासी बाहुल्य गावों में मलेरिया का प्रकोप हर वर्ष मौतों की वजह बनती है। बालको के बेलाकछार, तापर, नकटीखार में इस साल भी मौत के कई मामले सामने आए हैं। वहीं बालको के फुठामुड़ा की कोरवा बस्ती में एक माह के भीतर मलेरिया से एक ही घर में 2 लोगों की मौत होने से सरकार की स्वास्थ सेवाओं के दावे पर सवालिया निशान लग गया है।
जबकि राज्य सरकार द्वारा कहा जा रहा है कि हम 2030 तक मलेरिया मुक्त राज्य बन जाएंगे। सरकार द्वारा यह प्रचारित किया जा रहा है कि राज्य सरकार छत्तीसगढ़ को स्वस्थ छत्तीसगढ़ बनाने के लिए संकल्पबद्ध है और इसके लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा राज्य को 2030 तक मलेरिया मुक्त राज्य बनाने की दिशा में कार्ययोजना भी तैयार की जा रही है।
वहीं स्थानिय अखबार के अनुसार यहां की तिहारो बाई बुखार से तप रही है और कुछ दिन पहले ही इलाज के अभाव में उसके मासूम की मौत हो गई थी । बताया गया कि कोरबा तक आने के लिए इनके पास पैसे नहीं थे।

राज्यसभा सांसद छाया वर्मा कहती हैं कि ‘’शासन प्रत्येक जिलों में सैकड़ों शिविर लगाने का दावा कर रहा है, लेकिन पहाड़ी कोरवाओं को आज भी इलाज़ की दरकार है। इन्हें मुख्यधारा में जोड़ना तो दूर की बात है इन्हें पीने के लिए साफ पानी भी मुहैय्या कराने में राज्य सरकार असफल है जिसकी वजह से पहाड़ी कोरवा दूषित पानी पीने के लिए मजबूर हैं।‘’

छत्तीसगढ़ के पूर्वी क्षेत्र में रहने वाले पहाड़ी कोरवा आदिवासियों की बहुत पुरानी नस्ल है जिनका अपना विशिष्ट रहन,सहन,खान-पान, सभ्यता और संस्कृति है। इस जनजाति पर बढ़ रहे खतरे को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने इसे संरक्षित सूची में स्थान दिया है। लेकिन तेजी से कट रहे जंगल और बीमारियों के पसरने से ये जनजातियां विलुप्त हो रही हैं। राज्य सरकार ने इनके विशेष अभिकरण बना रखे हैं जिसमें पहाड़ी कोरवा विकास अभिकरण जशपुर एवं कोरबा में 120 गांव तथा पहाड़ी कोरवा विकास अभिकरण सरगुजा के तहत रायगढ़ व सरगुजा के 264 गांव शामिल हैं। कोरबा जिले में 610 से अधिक पहाड़ी कोरवा परिवार हैं जिसमें कोरबा विकासखंड में 590 परिवार दुर्गम इलाकों में रहते हैं। कहा जाता है कि मौसम के बदलने से बीमारियों की मार भी इन आदिवासियों को झेलनी पड़ती है। नतीजतन पहाड़ी कोरवा जनजाति की संख्या पिछले कुछ सालों में घटते-घटते 10,825 रह गई है।

तखतपुर के आदिवासी युवक प्रशांत प्रधान इस पर चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं कि ‘’पहाड़ी कोरवा प्रमुख रूप से जड़ी-बूटी एकत्रित करने का काम करते हैं लेकिन आज बड़ी विसंगती ये है कि वे खुद रोगों की चपेट में आकर दम तोड़ रहे हैं।‘’

मलेरिया या अन्य रोगों का संक्रमण ना सिर्फ पहाड़ी कोरवाओं तक सीमित है बल्कि विशेष पिछड़ी जनजातियों अबूझमाड़िया, कमार, पहाड़ी कोरबा, बिरहोर एवं बैगाओं में भी उतनी ही खतरनाक तरीके से पसरा हुआ है।
इन आंकड़ो से इसकी भयावहता का अनुमान लगाया जा सकता है,जहां पंडरिया विकासखंड के 10 गांवों में फैले मलेरिया से 15 दिन के भीतर तीन लोगों की मौत हो गई वहीं लगभग 55 बैगा आदिवासी अब भी मलेरिया से पीड़ित है। अमनिया पंचायत के ही अमलीटोला में 45 वर्षीय भांगर बैगा की भी मौत कुछ दिन पहले हुई है। इससे पहले मलेरिया से ही दो बच्चियों की मौत हो चुकी है। स्थानिय समाचार-पत्रों के मुताबिक बस्तर में पिछले चार महीने में ही इस बीमारी से 2906 लोग पीड़ित हो चुके हैं। जिसमें बच्चों से लेकर वृद्ध तक शामिल हैं। पिछले साल भी समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण करीब आधा दर्जन लोगों की मौत इस बीमारी के चलते हुई थी।
हमारे देश के लिए ये एक गंभीर विषय है कि हर साल मलेरिया की चपेट में हजारो लोगों की जान चली जाती है।विश्व स्वास्थ्य संगठन के रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 हज़ार लोगों की मौत मलेरिया की वजह से होती है। वहीं चिकित्सा पत्रिका लांसेट में छपे एक लेख में दावा किया गया है कि हर साल भारत में दो लाख से अधिक लोगों की मौत मलेरिया से होती है।हालांकि ये संख्या विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान से 13 गुना ज्यादा है लेकिन लांसेट का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास क्लीनिक और अस्पतालों में होने वाली मौतों की संख्या के आंकड़े उपलब्ध हैं जबकि बड़ी संख्या में मलेरिया से लोगों की मौतें घरों पर होती हैं।

वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी मिथिलेश गुप्ता बताते हैं कि ‘’हजारों सालों से जंगल रह रहे इन जनजातियों के लिए इन आधुनिक बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती है साथ ही जिन क्षेत्रों में ये जनजातियाँ निवास कर रही है वहां परजीवियों की संख्या भी अधिक है जिससे बारिश के बाद संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है।‘’ इसके अलावा वे बताते हैं कि ‘’सरकार भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं दे पा रही हैं जिसके कारण इससे निपटना बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है।‘’

इस बात से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि कोरवा जनजाति के संरक्षण अथवा स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था को लेकर हमारी सरकारें कितनी गंभीर हैं।

अपनी नई पार्टी के लिए जमीन तैयार कर रहे विधायक अमित जोगी ने भी इस मुद्दे पर राज्य सरकार को जमकर सुनाई थी एक कार्यक्रम में अमित जोगी ने कहा था कि ‘’प्रशासन ने जिस तत्परता से हम पर लाठीचार्ज करने के आदेश दिए, उतनी तत्परता अगर मलेरिया निरोधक दवा के छिड़काव और आदिवासियों पर ध्यान देने में लगाई होती तो आज यह स्तिथि उत्पन्न नहीं होती।‘’ साथ ही उन्होंने कहा कि ‘’राष्ट्रपति के दत्तकपुत्र कहे जाने वाले वनांचल में रह रहे आदिवासियों की हालत स्वयं मुख्यमंत्री के गृह जिले में दयनीय बनी हुई है।‘’

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