कितने योगेश और जलेंगे?

पिछले दिनों एक विकलांग युवक योगेश साहू ने छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्मदाह कर अपनी जान दे दी। बताया जा रहा है कि  बेरोजगारी से परेशान विकलांग युवक को मुख्यमंत्री के जनदर्शन में जाने से रोका गया था। वह मुख्यमंत्री से रोजगार और अपनी बहन की शादी के लिए सहयोग की अर्जी लगाना चाह रहा था, लेकिन मुख्यमंत्री जनदर्शन में जाने से उसे रोके जाने पर क्षुब्ध होकर युवक ने अपने ऊपर पेट्रोल छिड़ककर खुद पर आग लगा ली।

एक तरफ जहां युवक के द्वारा आत्महत्या के लिए कदम उठाना बेरोजगारी की मार और शासन के प्रति रोष की पराकाष्ठा को प्रकट करता दिखाई दे रहा है वहीं रोहित वेमुला से लेकर किसान आत्महत्या, परीक्षा मे ज़्यादा अंको का दबाव  या पारिवारिक कलह से परेशान होकर मौत को गले लगाने की बढ़ती प्रवृत्ति हमारे समाज के लिए एक गंभीर सवाल भी छोड़ रहा है? भारत के लिए ये समस्या इसलिए भी एक चुनौती है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में सबसे अधिक आत्महत्या की घटना भारत में हो रही है। प्रीवेटिंग स्यूसाइड नाम की रिपोर्ट के मुताबिक भारत मे वर्ष 2012 तक 2,58,075 लोगों ने आत्महत्या की। जबकि दुनिया भर में हर साल लगभग आठ लाख लोग अपनी जान ले लेते हैँ।लेकिन ऐसी घटनाओं पर हो रही राजनीति घटना की गंभीरता को समझने  के बजाए बेतुके बयानों से  अंगभींर और अपरिपक्व किस्म का रवैया अपनाता दिखाई दे रहा है।

युवक की मौत के बाद इस पर  छत्तीसगढ़ की सियासत तो  तेज होनी ही थी, लेकिन इस मामले पर नेताओं की सामने आ रही अपरिपक्वता भी राजनीतिक संवेदनहीनता की ओर इशारा कर रही है। इस घटना पर मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह ने कहा ‘’कि पूर्व में किसी ने मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्महत्या नहीं की क्या ? इसलिए इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।‘’ मुख्यमंत्री यह बोलकर इस विमर्श पर विराम लगाने की मंशा प्रदर्शित करते नज़र आ रहे हैं।  मुख्यमंत्री के ऐसे  बयान के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे इस घटना को कितनी संज़िदगी से ले रहे हैं।

वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने रमन सिंह को कोसते हुए युवक के आत्महत्या को साहसिक कदम करार दिया। जोगी ने कहा कि ‘’मैं आत्महत्या के प्रयास को सबसे साहसिक कदम मानता हूँ,खुद को जलाने के लिए साहस की ज़रूरत होती है।‘’ इस मुद्दे पर रमन सिंह को सही तरीके से घेरने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए बयान ना देकर जोगी द्वारा इसे साहसिक करार देना, आत्महत्या की स्वीकृति और  राजनीतिक विमर्श को गलत दिशा में ले जाने जैसा माना जा सकता है।  लेकिन इस मसले पर समाज के प्रबुद्ध वर्ग काफी चिंतित दिखाई दे रहे हैँ।

इस पर वरिष्ठ पत्रकार अजीत सिंह कहते हैं कि ‘आत्महत्या जैया कदम गंभीर मानसिक पीड़ा की हालात को व्यक्त करता है।इसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता लेकिन इसके कारणों को समझना जरूरी है।‘’ वे आगे कहते हैं कि खासतौर पर बेरोजगारी, कर्ज जैसी वजहों से होने वाली आत्महत्याएँ अर्थव्यवस्था की  सामाजिक असुरक्षा या विकल्पहीनता की ओर इशारा करती है।इसे व्यक्तिगत मामले या हादसे समझकर नज़रअंदाज करना उचित नहीं है।‘’

इन बातों को आंकड़ो से भी समझा जा सकता है क्योंकि सन 2012 के आंकड़े बताते हैं कि 75 प्रतिशत आत्महत्या के मामले मध्यम और कम आय वाले देशों में हुए हैं।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी ऐसी घटनाओं पर सरकार को कटघरे मे खड़ा करते हुए कहते हैं कि ‘’बेकारी की समस्या का समाधान करने में राज्य सरकार की असफलता ही इसका प्रधान कारण है।‘’

लेकिन गुरूघासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर के सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन डॉ. अनुपमा सक्सेना इसकी वजह असहायताबोध को मानती हैं वे कहती हैं कि  ‘’विकल्पहीनता से ज्यादा यह मुद्दा विकल्पों को न प्राप्त कर पाने की असहायता के बोध का है।नीतिगत विफलताएं,भ्रष्टाचार,आम आदमी के प्रति उदासीनता साथ ही समाज की भी निरपेक्षता इस असहाय बोध के प्रति ज़िम्मेदार है।‘’ वे आगे कहती हैं कि ‘’कोई अचानक आत्महत्या नहीं करता पहले अपना दुःख दर्द सब जगह लेकर जाता है। साथ ही वे इसके निदान पर जोर देकर कहती हैं कि जितना ध्यान एक व्यक्ति के मर जाने के बाद असकी समस्याओं और जरूरतों पर सरकार और समाज देती है उतना ही अगर जीवित भटकने पर दे दिया जाए तो ऐसी घटनाएँ निश्चित तौर पर कम हो जाएंगी।‘’

हमारे देश में पिछले दो दशकों में आत्महत्या के मामलों में 2.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार आज भारत में 37,8 फीसदी आत्महत्या करने वाले लोग 30 वर्ष से भी कम उम्र के हैं। इसे युवा पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव 25 सालों के व्यवस्था में आए बदलाव के नज़रिए से देखते हैं अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि ‘’इस तंत्र को आप उदारीकरण, मुक्त बाजार,क्रोनी पूंजीवाद,असमान विकास,कारपोरेट एकाधिकार,वैश्वीकरण का मिश्रण मान सकते हैं,जिसके मूल में संसाधनों का असमान बँटवारा है।‘’ वे इस पर आगे जोड़ते हैं कि ‘’हर खुदकुशी के कारण अलग-अलग होते हैं किसान की खुदकुशी,रोहित वेमुला और इस युवक की खुदकुशी को एक पड़ले में नहीं रखा जा सकता। तीनों का कैरेक्टर अलग-अलग है। हम लोग सरली करण के आदी हैं इसलिए हर चीज़ का दोष सरकार पर डाल देते हैं,यह जानते हुए भी कि राज्य अब कल्याणकारी नहीं रह गया है।‘’

वहीं भारतीय जनता युवा मोर्चा स्टडी सर्किल के राष्ट्रीय प्रभारी जयराम विप्लव इस पर वर्तमान केन्द्र सरकार को इसके लिए सकारात्मक कदम उठाने वाला मानते हैं। वे कहते हैं कि ‘’ये स्थिति आज की नहीं है ये रोग सत्तर साल पुराना है जब समाज की हर ज़िम्मेदारी को लोक कल्यणकारी सरकार ने अपने हाथ में ले लिया लेकिन उस ज़िम्मेदारी को पूरा करने में बहुत हद तक असफल रहे हैँ।  आज रोजगार और उच्च शिक्षा का विकेन्द्रीकरण करना ज़रूरी है स्वरोजगार और नौकरी के रास्ते खोलने होंगे इस दिशा मे पहली बार केन्द्र सरकार कुछ योजनाएं और नीतियाँ लेकर आ रही है।‘’

ऐसे तो इन बातों से सकारात्मकता आनी चाहिए, मगर इस पर हो रही स्वार्थपूर्ण राजनीति विमर्श को भटका रही है। अतः सामाजिक,आर्थिक और मानसिक दबाव को दूर करने के विकल्प की ओर सरकार और समाज को शीघ्र ध्यान देना चाहिए ताकि फिर किसी को अग्नि स्नान ना करना पड़े।

 

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