तीसरे विकल्प की ईमानदार कोशिश या..??

‘’छत्तीसगढ़ में बदलाव की नींव रखी जानी है।हमारे पास समर्थन,संगठन,संघर्ष और समर्पण की चार ऐसी शक्तियाँ हैं जिसके बल पर हम बदलाव की नींव रखने जा रहे हैं।‘’

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छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कांग्रेस से अलगाव के बाद उनके विधायक पुत्र अमित जोगी का यह उद्बोधन ना केवल कांग्रेस,भाजपा दलों के लाभ हानि का प्रश्न रह गया है बल्कि छत्तीसगढ़ में तीसरे विकल्प की दिशा में महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जाना चाहिए ।क्योंकि क्षेत्रीय पार्टी की कमी की वज़ह से ऐसे कई मौके आते रहे हैं जब राष्ट्रीय दलों के आगे स्थानीय मुद्दे उपेक्षित हुए हैं जिसके चलते जनता के भीतर असंतोष के स्वर भी यदा कदा फूटते रहे हैं लेकिन विकल्प की कमी की वज़ह से लोकबाग दोनों दलों को ही मत समर्पित कर मन मारते रहे हैं।

भारतीय परिसंघ में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की बहुलता इस मायने में काफी महत्वपूर्ण है जो कि राष्ट्रीय शुभेच्छाओं के साथ क्षेत्रीय अस्मिता को भी बनाए रखती है।

लेकिन इन शुभेच्छाओं पर अजीत जोगी कहां तक खरे उतरते हैं यह सवालों के घेरे में है…

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पहला प्रश्न छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय दलों के उभार और जन समर्थन की ऐतिहासिकता को लेकर है क्योंकि यह पहला मौका नहीं है जब छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय दल निर्माण की प्रक्रिया चल रही हो बल्कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पूर्व शंकर गुहा नियोगी ने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की नींव डाली थी और मोर्चा ने 1985 के विधानसभा चुनाव में पहली जीत भी दर्ज की थी तब जनक लाल ठाकुर विधायक निर्वाचित हुए थे और 1991 में  वे फिर से चुने गए लेकिन इसके बाद कोई खास सफलता इस पार्टी के हिस्से नहीं आई और ‘विरोध नहीं विकल्प’ कहने वाली यह पार्टी  कथित वोटकटवा पार्टी बनकर रह गई।

फिर छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व में आने के बाद गोड़वाना गणतंत्र पार्टी भी अपना भाग्य आजमाती रही लेकिन जनता का भरोसा जीतने में  हर बार नाकाम रही। फिर भाजपा से दो बार विधायक और चार बार सांसद रहे ताराचंद साहू ने भरतीय जनता पार्टी से अलग होकर 2008 में यह कहकर एक नई पार्टी छत्तीसगढ़ स्वाभीमान मंच की नींव डाली थी कि ‘’छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश,गुजरात,मणीपुर,गोवा,राजस्थान और दिल्ली को छोड़कर सभी जगह क्षेत्रीय दलों के सहयोग से ही सरकारें बनी हैं,अब छत्तीसगढ़ में भी कोई भी राष्ट्रीय पार्टी मंच के सहयोग के बिना सरकार नहीं बना पाएगी।‘’ लेकिन उनके द्वारा  क्षेत्रीय अस्मिता और उपेक्षा को मुद्दा बनाने के बाद भी असफलता ही हाथ आई फिर ताराचंद साहू की मृत्यु के बाद पार्टी की कमान उनके बेटे दीपक साहू को मिली जिन्होंने  इस पार्टी का भाजपा में  विलय कर दिया और तारा चंद साहू की बात सिर्फ बात बनकर रह गई। इस तरह जनता की उदासीनता और राजनीतिक ईमानदारी की कमी की वजह से छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की राय नई पार्टी के पक्ष में दिखाई नहीं दे रही है।

दूसरा सवाल पार्टी निर्माण के कारण और इस पर प्रभाव डालने वाली परिस्थितियों के आलोक में है। जिसमें हाल फिलहाल जोगी पिता-पुत्र छत्तीसगढ़ियों की उपेक्षा,आउटसोर्सिंग,बाहरीवाद के मुद्दे पर पूरी ताकत से आवाज़ लगाते नजऱ आ रहे हैं लेकिन कांग्रेस से निलम्बन के बाद इस दर्द का फूटना क्षेत्रीय हित के लिए पार्टी गठन से कहीं ज्यादा निलम्बन और पार्टी में घटते महत्व के प्रत्युत्तर स्वरूप खिसियाहट प्रतीत हो रहा है।इसलिए अमित जोगी का ‘ग्राम आवाज’ में यह बोलना कि ‘’हम जोगी हैं,आप हमसे सब कुछ छिन सकते हैं आप हमारी उन सम्पत्तियों को नहीं छिन सकते जिनको हमने वर्षों के प्यार और विश्वास से कमाया है।‘’ जोगी के इस कथन में भी नई पार्टी गठन के लिए समर्पण की बजाय अपनी ताकत प्रदर्शन का दंभ अधिक दिखाई देता है ऐसे  दलगत स्वभाव को यहां की जनता हर बार नकारती रही है।हाँलाकि अजीत जोगी का दावा है कि उनके पास दस लाख समर्थकों की फौज है लेकिन गौर करने की बात ये है कि वे सारे समर्थक कांग्रेस के जोगी गुट के हैं जिससे कांग्रेस का सिर्फ मत विभाजन होगा और जोगी के दंभ की संतुष्टि।  कुछ ऐसी ही परिस्थितियां उस समय पैदा हुई थी जब 2003 में विद्याचरण शुक्ल ने कांग्रेस से बगावत कर शरद पवार की पार्टी ऱाष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर कांग्रेस को काफी नुकसान पहुँचाया था फलस्वरूप कांग्रेस पार्टी को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था।इसके अलावा  जोगी पर भी पार्टी को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं।ऐसे में नई पार्टी की व्यापकता भी काफी कम हो सकती हैं।

 

तीसरा सवाल करिश्माई छवि आधारित जनमानस में व्यापक प्रभाव की सीमाएं और  उत्प्रेरक तत्वों की मौजूदगी  को लेकर है,जो कि किसी भी संगठन के निर्माण में अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।एक करिश्माई नायक के नेतृत्व के बल पर संगठन खड़ा करना सुगम होता है।अगर इस दृष्टिकोंण से हम जोगी पिता-पुत्र का मुआयना करें तो एकबारगी ज़रूर हम छत्तीसगढ़ की राजनीति में उनकी दख़लअंदाज़ी को करिश्माई छवि के परिपेक्ष्य में रखेगे लेकिन जिस तरह कांग्रेस पार्टी में ही इनको हाशिए पर धकेल दिया गया है इसे तो इनकी घटती लोकप्रियता ही कहेंगे और अजीत जोगी को लोकसभा चुनाव में मिली हार ने काफी हद तक इनकी ताकत को कमतर किया है,फिर अंतागढ़ टेपकांड के बाद तो रही सही कसर भी पूरी हो गई,विरोधियों को बरसने का पूरा मौका मिल गया और जनता के बीच एक अलग छवि बन गई जिसे सकारात्मक नहीं कहा जा सकता।इसका असर भी नए संगठन की राह में बाधक की तरह पड़ सकता है।

लेकिन इसके अलावा सबसे अच्छी बात जोगी पिता-पुत्र के लिए ये है कि अभी छत्तीसगढ़ में   बदलाव का मौसम दिखाई दे रहा है क्योंकि छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के लगातार चल रहे आंदोलन,भाजपा नेता सोहन पोटाई और नंदकुमार साय के बगावती तेवर के साथ-साथ बाहरीवाद के ख़िलाफ स्थानीयता को तरज़ीह देने की मांग ज़ोरो पर है  जिसका फायदा कुछ हद तक इनको ज़रूर मिल सकता है लेकिन तीसरे विकल्प की इस कवायद में पूरा दारोमदार इस आखिरी और अहम सवाल में टिका हुआ है कि पार्टी गठन की ईमानदार कोशिश में अजीत जोगी और अमित जोगी  कब तक कायम रहते हैं और छत्तीसगढ़ की राजनीति को किस दिशा में ले जाते हैं।

 

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