“यहाँ झूमने गाने का मतलब खुश होना नहीं होता”

वो ऐसे झूमते थे कि वहां मौजूद लोग भी थिरकने लगते थे,उनकी तान इतनी मीठी होती थी कि रोम रोम में मिश्री घुल जाए,वे जब साज पर अपनी उंगलियाँ फेरते थे तब संगीत के साथ-साथ उदास दिलों में भी खुशियाँ चहक उठती थी. ..उनके बारे में कहा जाता है कि वे कभी गोंड राजा के दरबार की शोभा बढ़ाया करते थे उनका पूरा समुदाय खुशियों की तिजोरियां राजा के दरबार में न्योछावर किया करते थे,लेकिन इसके बदले उनको क्या मिला? कहा जाता है कि एक दिन राजा ने किसी कारणवश उन सबको  दरबार से निकाल दिया.फिर वे सब घुमंतू हो गए लेकिन गीत,संगीत,नाचने,झूमने से उनका वास्ता बरकरार रहा, आखिर वे करते भी क्या उनकी सारी पीढ़ियों की कुल जमा पूंजी यही तो थी इसके अलावा वे कुछ भी नहीं जानते थे….  नृत्य,गीत,संगीत यही उनका समर्पण,जीवन और आजीविका का ज़रिया था….20150401_150710~2

जब मैं अपने बचपने को खंगालता हूँ तो आज भी कुछ धुंधली सी तस्वीरें किसी   मोंटाज़ की तरह आँखों के सामने गुजरने लगती हैं..कभी मृदंग की थाप पर थिरकती हुई एक महिला दिखाई देती है,कभी उनके श्रृंगारिक गीतों के बोल कान में कुछ बुदबुदाने से लगते हैं,कभी गोदना(एक किस्म का टेंटू) गुदती एक बुढ़िया,कभी रीठा और सील-लोढ़ा बेचने के लिए गलियों में गीत अलापती उनकी टोलियाँ, तो कभी सारंगी या चिकारा बजाते उस बूढ़े बाबा के हाथों को  निहार पाता हूँ जो हाथ शायद  युगों-युगों से संगीत साधना में मग्न है..तो कभी मैं मृदंग को थपकिया देने वाली  उनकी टोलियों के युवकों से पूछता हूँ कि तुम्हारे पंजों में ये छालें क्यों है? तब वे युवक केवल मुस्कुरा देते हैं , लेकिन अब ज़वाब की एक चिट्ठी मेरी यादों से होकर मेरे वर्त्तमान में आती है तब मैं पढ़ता हूँ कि “वे छाले नहीं बल्कि एक संगीत साधनारत समुदाय की ख़ास निशानी है जो अपने छालों की परवाह किए बगैर केवल खुशियाँ बांटते फिरते थे  ”,सचमुच उनके फफोलों से भी संगीत रिसती थी.20150401_141759-120150401_141933

यही सोचकर मैं किसी तरह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में रहने वाले इन घुमंतुओं के डेरे में पहुँचता हूँ,एक झोपड़ी के सामने टंगे फटा हुआ ढोल मुझसे  कुछ कहता है मैं उसके समीप पहुँचता हूँ..तभी झोपड़ के अन्दर से आवाज़ आती है “कौन?’मैं कुछ बोल पाता कि उससे पहले पीछे से एक महिला की आवाज़ आती है “भैय्या साहेब आए हे..”,दरअसल वे मुझको कोई सरकारी अफसर  समझ रहे हैं जो वक़्त बेवक्त झिड़की देने आ टपकते हैं.युवक के बाहर आते ही मैं उनको अपने बारे में बताता हूँ ,जब मैं युवक से नाच-गान के बारे में पूछता हूँ तो वो फटे हुए ढोल की ओर देखते हुए ज़वाब देता है कि “बड़े-बुज़ुर्ग ये सब काम किया करते थे,अब कहाँ…तभी पीछे खड़ी महिला अपने दादी के बारे में ज़िक्र करती है और मैं बिना समय गंवाए उनके पास पहुँचता हूँ..दादी कहती है ‘’अब कहाँ का नाचना-गाना बेटा….सब गया अब हम घूरे में रहते हैं, और कचरा इकठ्ठा करते हैं… ये कहते हुए वो बूढ़ी दादी गाने लगती है..

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“आज कहाँ डेरा बाबू काल कहाँ डेरा,नदिया के पार माँ बधिया के डेरा,तरी करे सांय-सांय रतिहा के बेरा”(आज हमारा डेरा कहाँ है,कल कहाँ होगा,नदी के किनारे डेरा होगा जहाँ रात सांय-सांय करती है) मेरे हिसाब से ये पंक्तियाँ उदासी की सर्वोत्कृष्ट पंक्तियों में से एक होगी.

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मैं आस-पास के जनजीवन का मुवायना करता रहा गीत-संगीत तो केवल अब उनकी बूढ़ी आँखों और आवाजों में कैद है जो शायद कुछ सालों में दम तोड़ देगी,लेकिन मायूसी,तंगहाली और कूड़े के ढेर में रहने को विवश इन कलाकारों की वर्त्तमान पीढ़ियाँ अशिक्षा,मुफलिसी,बीमारियों से त्रस्त शासन के योजनाओं से दूर  हाशिए पर हैं,कला का सरंक्षण तो छोडिए इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है..वो बूढ़ी दादी सही बोलती है कि “नाचने गाने से अब ख़ुशी नहीं मिलती”..दर-दर की ठोकरे खाते वे “देवार” जाति के लोग अब संगीत से अलग-थलग और मुख्यधारा से कोसो दूर कचरे के ढेर में जीने के लिए विवश हैं..

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